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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 45–53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, verses 45–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 45-53

संस्कृत श्लोक

यदिदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजङ्गमम् । सर्वं सर्वप्रकाराढ्यं ससुरासुरकिन्नरम् ॥ ४५ ॥ तन्महाप्रलये प्राप्ते रुद्रादिपरिणामिनि । भवत्यसददृश्यात्म क्वापि याति विनश्यति ॥ ४६ ॥ ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् । अनाख्यमनभिव्यक्तं सत्किंचिदवशिष्यते ॥ ४७ ॥ न शून्यं नापि चाकारं न दृश्यं न च दर्शनम् । न च भूतपदार्थौघो यदनन्ततया स्थितम् ॥ ४८ ॥ किमप्यव्यपदेशात्म पूर्णात्पूर्णतराकृति । न सन्नासन्न सदसन्न भावो भवनं न च ॥ ४९ ॥ चिन्मात्रं चेत्यरहितमनन्तमजरं शिवम् । अनादिमध्यपर्यन्तं यदनादि निरामयम् ॥ ५० ॥ यस्मिञ्जगत्प्रस्फुरति दृष्टमौक्तिकहंसवत् । यश्चेदं यश्च नैवेदं देवः सदसदात्मकः ॥ ५१ ॥ अकर्णजिह्वानासात्वग्नेत्रः सर्वत्र सर्वदा । श्रृणोत्यास्वादयति यो जिघ्रेत्स्पृशति पश्यति ॥ ५२ ॥ स एव सदसद्रूपं येनालोकेन लक्ष्यते । सर्गचित्रमनाद्यन्तं स्वरूपं चाप्य रञ्जनम् ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ का ही प्रलयाख्यायिका द्वारा समर्थन करने के लिए प्रकरणान्तर का आरम्भ करते हैं। विविध प्रकार की वस्तुओं में परिपूर्ण तथा देवता, असुर, किन्नर, आदि से अधिष्ठित सम्पूर्ण जो कुछ भी यह सचराचर जगत्‌ दिखाई देता है, वह रूद्र आदिका भी तिरोधान करनेवाले महाप्रलय में असद्‌ एवं अदृश्यस्वरूप होकर न मालूम कहाँ चला जाता है, विनष्ट हो जाता है, उसके अनन्तर नाम और रूप से रहित शान्त गम्भीर केवल "सत्‌" ही अवशिष्ट रहता हे, जो अनन्तरूप से स्थित है वह न तेज है और न व्याप्त अन्धकार ही हे । न वह शून्य ही है, न आकारवान्‌ ही है, न दृश्य है, न दर्शन है ओर न भूत-भोतिक पदार्थसमूह ही है । नामरहित होनेसे वह अव्यपदेश्यस्वरूप है (उसके स्वरूप का निर्वचन नहीं किया जा सकता) ओर पूर्ण से भी पूर्णतर आकारवाला है । न वह व्यक्त है, न अव्यक्त है, न व्यक्ताव्यक्त है, न वह कालसम्बन्ध ही है ओर न कालसम्बन्धवान्‌ ही है । वह दुश्यशून्य, चिन्मात्र, अनन्त, अजर, शिव, आदि, मध्य और अन्त से रहित, कारणशून्य ओर निर्दोष है । जिसमें यह सम्पूर्ण जगत्‌ चित्र, भ्रान्ति आदि में देखे गये मुक्तामय हंस की नाई प्रस्फुरित हुआ है और जो व्यक्त ओर अव्यक्त दोनों अवस्थाओंमें अनुगत हे, वह केवलरूप देव अध्यारोपदृष्टि से जगद्रूप हे ओर अपवाद दृष्टि से जगद्रूप नहीं है (७७) । जिसके न कान है, न जीभ हैं, न नासिका है, न त्वचा है और न नेत्र हैं फिर भी वह सदा सभी जगह सुनता है, स्वाद लेता है, सूँघता है, छूता है और देखता है । जिस प्रकाश से पूर्वोक्त सद्‌ और असद्रूप प्रपंच दिखाई देता है, वह चैतन्यरूप आलोक भी वही है । अज्ञान के रहनेपर विविध सृष्टियाँ करनेवाला वही है और अज्ञानकी निवृत्ति होने पर आदि ओर अन्त से शून्य स्वरूप को पाकर चित्प्रकाशस्वरूप भी वही है