Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 4–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, verses 4–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 4-13
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथास्थितमिदं यस्य व्यवहारवतोऽपि च ।
अस्तं गतं स्थितं व्योम जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ ४ ॥
बोधैकनिष्ठतां यातो जाग्रत्येव सुषुप्तवत् ।
या आस्ते व्यवहर्तैव जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ ५ ॥
नोदेति नास्तमायाति सुखे दुःखे मुखप्रभा ।
यथाप्राप्तस्थितेर्यस्य जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ ६ ॥
यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते ।
यस्य निर्वासनो बोधः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ७ ॥
रागद्वेषभयादीनामनुरूपं चरन्नपि ।
योऽन्तर्व्योमवदच्छस्थः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ८ ॥
यस्य नाहंकृतो भावो यस्य बुद्धिर्न लिप्यते ।
कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ९ ॥
यस्योन्मेषनिमेषार्धाद्विदः प्रलयसंभवौ ।
पश्येत्त्रिलोक्याः स्वसमः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ १० ॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोन्मुक्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ११ ॥
शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः ।
यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ १२ ॥
यः समस्तार्थजातेषु व्यवहार्यपि शीतलः ।
पदार्थेष्वपि पूर्णात्मा स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले जीवन्मुक्ति होती है, तदुपरान्त विदेहमुक्त होती है, परन्तु श्लोक में श्रीरामचन्द्रजी
ने पहले विदेहमुक्ति का लक्षण पूछा है, पश्चात् जीवन्मुक्ति का। पाठक्रम से अर्थक्रम बलवान्
होता है, इस न्याय से पाठ क्रम का उल्लंघन करके श्रीवसिष्ठजी ने पहले जीवन्मुक्ति के
लक्षण का प्रतिपादन किया ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जिन कर्मोका शास्त्र में निषेध नहीं हे, उनको
करते हुए भौ जिस पुरुष का यथास्थित यह विश्व परमार्थ दृष्टि से निवृत्त होकर आकाश की
नाई शून्य हो जाता है, दर्पण मेँ स्थित नगर की नाई प्रतीत होता हुआ भी हे ही नहीं, वह
जीवन्मुक्त कहा जाता हे । जो व्यवहार करता हुआ ही “नैव किचित्करोमीति युक्तो मन्येत
तत्ववित्“ इस भगवद्रचन के अनुसार जाग्रत् अवस्था में भी सुषुप्त के समान निर्विकार रहता
है, बोधनिष्ठता को प्राप्त वह जीवन्मुक्त कहा जाता है जिसकी मुखकान्ति क्रमशः सुख
ओर दुःख में उदित ओर अस्त नहीं होती अर्थात् जिसकी मुखकान्ति सुख मेँ विकसित और
दुःख में म्लान नहीं होती ओर जो कुछ मिल गया उससे जीवननिर्वाह करता है, वह जीवन्मुक्त
कहा जाता हे । जो निर्विकार आत्मा में सुषुप्त के समान स्थित रहता हुआ भी अविद्यारूपी
निद्राका विनाश होने से आत्मामें सदा जागरूक रहता हे । देह, इन्द्रिय आदि का बाघ हो जाने
से इन्द्रियों द्वारा पदार्थो की प्रतीतिरूपी जाग्रत अवस्था जिसकी नहीं है और जिसका ज्ञान
वासनारहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है । बाहर अनुराग, द्वेष, भय आदि का यथायोग्य
नट की नाई आचरण करता हुआ भी जो अन्दर आकाश की नाई निर्विकार है तथा निरावरण
स्वरूप आत्मा में स्थित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है । जिसमें अहंकार नहीं है और कर्म
कर रहे अथवा न कर रहे जिसकी बुद्धि कर्तृत्व और अकर्तृत्व के अभिमान से लिप्त नहीं होती,
वह जीवन्मुक्त कहा जाता हे । जो चिदात्मा के अर्ध आरवणभंग से तीनों लोकों का प्रलय ओर
अर्द्ध-आवरण से तीनों लोकों की उत्पत्ति देखता है एवं जो अपनी आत्मा मे सम है, वह
जीवन्मुक्त कहा जाता हे । जिससे अन्य लोगों को भय नहीं है और जिसको लोगों से भय नहीं
है यानी हर्ष, क्रोध ओर भय के हेतु अज्ञानाभिमान से रहित होने के कारण जिससे अन्य लोग
भयभीत नहीं होते ओर स्वयं जो अन्य लोगों से भयभीत नही होता, वह जीवन्मुक्त कहा
जाता है । जिसकी संसारविषयक सत्यताबुद्धि निवृत्त हो गई हे, जो दूसरों की दृष्टिमें देह
आदि अवयवो से युक्त होता हुआ भी निरवयव हे ओर जो सचेतन होता हुआ भी चित्तरहित
है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है । राग आदि के विषय पदा्थोमिं भी पूर्णात्मा (आत्मबुद्धि)
होकर जो पुरूष सम्पूर्ण पदार्थो में व्यवहार करता हुआ भी राग आदि से ताप को प्राप्त नहीं
होता, वह जीवन्मुक्त हे