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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

विदेहमुक्तो नोदेति नास्तमेति न शाम्यति । न सन्नासन्न दूरस्थो न चाहं न च नेतरः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वप्रथम जीवन्मुक्तता का विद्वानों द्वारा अनुभूत स्वरूपलक्षण कहते हैं । जिस पुरुष को विदेहमुक्ति प्राप्त हो जाती है, उसका फिर कभी न उदय (वृद्धि) होता है और न हास ही होता है। वह न तो शान्त ही होता है (और न अशान्त ही होता है), वह व्यक्त भी नहीं है, अव्यक्त भी नहीं है, दूरस्थ भी नहीं है और निकटस्थ भी नहीं है अर्थात्‌ सर्वव्यापी है । वह आत्मरूप नहीं है, यह भी नहीं कह सकते अर्थात्‌ वह आत्मरूप ही है और आत्मा से भिन्न देह, इन्द्रिय आदिरूप नहीं है, यह भी नहीं कह सकते, क्योकि सर्वस्वरूप होने से सब कुछ वही है