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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 16–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, verses 16–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 16-23

संस्कृत श्लोक

सूर्यो भूत्वा प्रतपति विष्णुः पाति जगत्त्रयम् । रुद्रः सर्वान्संहरति सर्गान्सृजति पद्मजः ॥ १६ ॥ खं भूत्वा पवनस्कन्धं धत्ते सर्षिसुरासुरम् । कुलाचलगतो भूत्वा लोकपालपुरास्पदः ॥ १७ ॥ भूमिर्भूत्वा बिभर्तीमां लोकस्थितिमखण्डिताम् । तृणगुल्मलता भूत्वा ददाति फलसंततिम् ॥ १८ ॥ बिभ्रज्जलानलाकारं ज्वलति द्रवति द्रुतम् । चन्द्रोऽमृतं प्रसवति मृतं हालाहलं विषम् ॥ १९ ॥ तेजः प्रकटयत्याशास्तनोत्यान्ध्यं तमो भवत् । शून्यं सद्व्योमतामेति गिरिः सन् रोधयत्यलम् ॥ २० ॥ करोति जंगमं चित्तः स्थावरं स्थावराकृतिः । भूत्वार्णवो वलयति भूस्त्रियं वलयो यथा ॥ २१ ॥ परमार्कवपुर्भूत्वा प्रकाशान्तं विसारयन् । त्रिजगत्त्रसरेण्वोघं शान्तमेवावतिष्ठते ॥ २२ ॥ यत्किंचिदिदमाभाति भातं भानमुपैष्यति । कालत्रयगतं दृश्यं तदसौ सर्वमेव च ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

लोकदृष्टि से उसका सर्वात्मरूप तटस्थलक्षण कहते हैं। वही सूर्य बनकर जगत्‌ को प्रकाश और धूप देता है, विष्णु बनकर सबका पालन-पोषण करता है, रुद्र बनकर सबका संहार करता है और ब्रह्मा बनकर विविध सृष्टियाँ करता है। वही आकाश बनकर वायुस्कन्धों को (ऊपर स्थित उनचास वायुरूप स्तरों को) तथा ऋषि, देव और असुरों को धारण करता है, वही सुमेरु ओर हिमालय बनकर इन्द्र आदि लोकपालों को धारण करता है । वही भूमि बनकर कभी विच्छिन्न न होनेवाली इस जनमर्यादा की रक्षा करता है ओर वही तिनके, झाड़ियाँ और लताएँ बनकर विविध फल देता है वही जल ओर अग्निका आकार धारण कर बरसता है ओर जलता है, वही चन्द्रमा बनकर अमृत बरसाता है, हलाहल विष बनकर मृत्यु पैदा करता हे । वही प्रकाश बनकर दिशाओं को प्रकाशित करता हे ओर तम बनकर अन्धकारको फैलाता है, शून्य होकर व्योमरूपता को प्राप्त होता है तथा पर्वत बनकर वायु आदिके वेग को रोकता हे । वही अन्तःकरण मेँ स्फुट अभिव्यक्त चैतन्य द्वारा जंगम जगत्‌ की ओर अनभिव्यक्त चैतन्य द्वारा जडाकृति बनकर स्थावर जगत्‌ की रचना करता हे । वही समुद्र बनकर पृथिवीरूपी स्त्री को, जैसे कड़ा स्त्रीको परिवेष्टित करता है वैसे ही, परिवेष्टित करता है । आवरणरहित चैतन्य रूप बनकर चैतन्य के प्रकाश से व्याप्त तीनों जगतो से लेकर त्र्यणुकपर्यन्त सम्पूर्ण पदार्थो का विस्तार करता हुआ भी स्वयं शान्त (निर्विकार) ही रहता है । अधिक क्या कहें, जो कुछ यह दृश्य इस समय प्रकाशित हो रहा है यानी वर्तमानमें स्थित है, जो कुछ पहले प्रकाशित हुआ था, यानी भूतकालमें स्थित था और जो कुछ आगे प्रकाश को प्राप्त होगा यानी जो भविष्यकाल में स्थित होगा वह सम्पूर्ण दृश्य यही हे, इससे अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं हे