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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 75

चौहत्तरवाँ सर्ग समाप्त पचहत्तरवाँ सर्ग ब्रह्माजी के प्रसन्न होने पर भी ज्ञान होने के कारण सूचीका वरलाभ के लिए चुपचाप रहना तथा ब्रह्माजी के वरदान से फिर उसकी देहप्राप्ति का वर्णन |

14 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, बोध होने के अनन्तर एक हजार वर्ष में ब्रह्माजी उसके पा…
  2. Verse 2सूची केवल जीवकलामात्र से युक्त थी, उसमें कर्मेन्द्रियाँ कोई थी नहीं, इसलिए उसने ब्रह्माजी…
  3. Verses 3–4उसके विचार-प्रकार को ही स्पष्टरूप से कहते हैं । मैं पूर्ण हो गई हूँ, मेरे सब सन्देह कट गय…
  4. Verse 5जैसे मैं यहाँ पर स्थित हूँ वैसे ही परमार्थरूपा मैं स्थित रहूँ, केवल परमार्थरूप सत्यकला को…
  5. Verse 6जैसे कि बालिका अपने संकल्प से उत्पन्न वेताल से युक्त होती है, वैसे ही इतने समय तक मैं अपन…
  6. Verse 7इस समय मेरा यह अविवेक आत्मविचार द्वारा अपने आप शान्त हो गया हे । अब प्राप्त हुए इष्ट और अ…
  7. Verses 8–10इस प्रकार के निश्चय से युक्त, कर्मेन्द्रियों से रहित, उस सूची को चुपचाप अवस्थित देखकर कर्…
  8. Verse 11फले हुए इस तप से तुम्हारा संकल्प सफल हो, फिर तुम स्थूलशरीर होकर इस पर्वत में हिमालय-वन की…
  9. Verses 12–13जैसे पहले बीज के अन्दर रहनेवाली वृक्षत्वजाति महद्वृक्षस्वरूप व्यक्ति से वियुक्त रहती है,…
  10. Verses 14–17जलशून्य होने के कारण शुभ्र स्पन्दरहित शरत्कालकी मेघमण्डली के समान ज्ञानी होने के कारण तुम…
  11. Verse 18तुम न्यायवृत्ति होओगी ओर अन्याय करनेवालों को नष्ट करोगी, जीवन्मुक्त होने के कारण अपने विव…
  12. Verse 19यह कहकर देवाधिदेव ब्रह्माजी आकाश से चले गये ओर सूची भी ब्रह्माजी ने जो कुछ कहा वह मुझे प्…
  13. Verse 20मन की कल्पना के अनुसार स्थूल शरीर का आविर्भाव हुआ, यह कहते है । पहले बिलस्त भर हुई, फिर उ…
  14. Verse 21उसके शरीर से अविकल शक्तिसम्पन्न तत्‌ तत्‌ अंग, इन्द्रियों के गोलक, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मे…