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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

इति निश्चययुक्तां तां सूचीं कर्मेन्द्रियोज्झिताम् । तूष्णींस्थिता सनियतिः स पश्यन्भगवान्स्थितः ॥ ८ ॥ ब्रह्मा पुनरुवाचेदं वीतरागां प्रसन्नधीः । वरं पुत्रि गृहाण त्वं किंचित्कालं च भूतले ॥ ९ ॥ भोगान्भुक्त्वा ततः पश्चाद्गमिष्यसि परं पदम् । अव्यावृत्तिस्वरूपाया नियतेरेष निश्चयः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार के निश्चय से युक्त, कर्मेन्द्रियों से रहित, उस सूची को चुपचाप अवस्थित देखकर कर्मफल की अवश्यंभाविता का नियमन करनेवाले ईश्वरसंकल्प से युक्त भगवान्‌ ब्रह्माजी खड़े रहे। प्रसन्न हुए ब्रह्माजी ने उस विरक्त सूची से फिर यह कहा : हे पुत्रि ! तुम वरदान लो, कुछ समय तक भूतल में विविध भोगों का अनुभव कर तदनन्तर तुम परम पद को प्राप्त होओगी । जिस नियति के स्वरूप का हम लोगों से भी परिवर्तन नहीं हो सकता, उसका तुम्हारे लिए यही निश्चय हे