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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, Verses 14–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

तपः करोमि परममखिन्नेनैव चेतसा । तपसैव महोग्रेण यद्दुरापं तदाप्यते ॥ १४ ॥ इति संचिन्त्य सा सर्वजन्तुजातजिघांसया । तपोर्थमथ सस्मार पर्वतं भूतदुर्गमम् ॥ १५ ॥ आरुरोह च तच्छृङ्गं स्थिरविद्युद्विलोचना । हस्तपादादिमद्देहा श्यामलेवाभ्रमण्डली ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

तो मेरी सर्वजनग्रसन मनोरथ सिद्धि कैसे होगी 2 इस शंका पर वह स्वयं कहती है। कभी परिश्रान्त न होनेवाले चित्त से मैं परम तप करूँ, जो वस्तु दुर्लभ होती है, वह भी उग्र तपस्यासे प्राप्त हो जाती है, ऐसा मन में विचार कर सम्पूर्ण जन्तुओं को मारने की इच्छा से उसने हिमालय पर्वतका, जहाँ अन्य प्राणी नहीं जा सकते, तपके लिए स्मरण किया । उसके नेत्र स्थिर बिजली के समान थे, वह हाथ, पैर से युक्त आकृतिवाली काली मेघमाला के समान उस पर्वत के शिखर पर चढ़ी