Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, Verses 10–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, verses 10–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 10-13
संस्कृत श्लोक
न कदाचन सा तृप्तिमुपयाता महोदरी ।
वडवानलजिह्वेव चिन्तयामास चैकदा ॥ १० ॥
जम्बूद्वीपगतान्सर्वान्निगिरामि जनान्यदि ।
अनारतमनुश्वासं जलराशिमिवार्णवः ॥ ११ ॥
मेघेन मृगतृष्णेव तन्मे क्षुदुपशाम्यति ।
अविरुद्धैव सा युक्तिर्ययापदि हि जीव्यते ॥ १२ ॥
मन्त्रौषधतपोदानदेवपूजादिरक्षितम् ।
सममेव जनं सर्वं निर्बाधं कः प्रबाधते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार किया-यदि मैं जम्बूद्वीप में रहनेवाले सब प्राणियों को जैसे सागर जलराशि को निगलता
है, वैसे ही सदा और प्रत्येक श्वास में निगलूँ, तो जैसे जल बरसने से मृगतृष्णा शान्त हो
जाती है, वैसे ही मेरी क्षुधा शान्त हो सकती हे । जिस युक्ति से आपत्ति में जीवित रहा जाय,
वह युक्ति विरुद्ध नहीं है, परन्तु मन्त्र, ओषधि, तप, दान, देवपूजा आदि से सुरक्षित सम्पूर्ण
जनों को एक साथ बे-रोक-टोक कौन बाधित कर सकता है ? भाव यह है कि एक साथ
सब लोगों को निगलने की युक्ति अशक्य होने से विरुद्ध ही है