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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, Verses 17–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, verses 17–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 17-19

संस्कृत श्लोक

तत्र गत्वाथ सा स्नात्वा तपः कर्तुं कृतस्थितिः । अतिष्ठदेकपादेन चन्द्रार्कास्पन्दलोचना ॥ १७ ॥ क्रमेण दिवसाः पक्षास्तस्या मासर्तवो ययुः । शीतातपेषु लीनायाः कृताया इव शैलतः ॥ १८ ॥ सा बभूवाभ्रमालायाः समासं स्तम्भिताकृतिः । कृष्णोर्ध्वगोर्ध्वकेशी च खमाहर्तुमिवोद्गता ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ जाकर तप करने के लिए निश्चय कर उसने स्नान किया, तदनन्तर सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रदीप्त ओर निश्चल नेत्रवाली वह कर्कटी एक पैर से खड़ी रही । पत्थर से बनाई हुई प्रतिमा के समान शीत और ताप में लीन उस कर्कटी के क्रमशः दिन, पक्ष, मास, ऋतु बीत गये । उस कर्कटीने मेघमाला के समान अपनी आकृति को स्थिर किया, उसका शरीर काला था, वह उपर को चलती थी, ओर उसके केश भी उपर को खड़े थे, अतः मालूम पडता था कि वह आकाश को निगलने के लिए उत्पन्न हुई हे