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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 63, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 63, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

यथा यच्चेत्यते हि तथैव तन्न बाह्यतो नान्तरतश्चैतत्समुदेति हि ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

क्योंकि रज्जु आदि पदार्थ जिस प्रकार से यानी सर्प के आकार से प्रतीत होता है, वह उसी प्रकार का विवर्तरूप से होता है, न कि परमार्थरूप से, क्योकि यह सर्प आदि रज्जु आदि के न तो बाहर उदित होता है और न भीतर