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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 63, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 63, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदेतद्ब्रह्मतत्त्वं सर्वथा सर्वदैव सर्वत एव सर्वशक्ति सर्वाकारं सर्वेश्वरं सर्वगं सर्वमेवेति ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

“नित्यादिविलासैब्रह्मिव विस्फूर्जीति” ऐसा जो कहा, सो किसके कारण ? इस शंका पर कहते हैं। श्रीवशिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, चूँकि यह मायाशबल ब्रह्म सम्पूर्ण वस्तुओं के रुपसे, सम्पूर्ण कालों में सम्पूर्ण देशों में सब पदार्थों का रूप धारण करने में सामर्थ्य युक्त है अतएव सर्वाकार सर्वज्ञ होने के कारण सबका नियमन करने में समर्थ है अतएव सर्वेश्वर, सर्वव्यापक और सर्वस्वरूप है

सर्ग सन्दर्भ

बासठवाँ सर्ग समाप्त तविरसठवाँ सर्ग ब्रह्म मायाशक्ति के विलास से जिस प्रकार सर्वस्वरूप से ओर सर्वतः स्फुरित होता है उसका प्रतिपादन ।