Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 63, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 63, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
एष त्वात्मा सर्वशक्तित्वाच्च क्वचिच्चिच्छक्तिं प्रकटयति क्वचिच्छान्तिं क्वचिज्जडशक्तिं क्वचिदुल्लासं क्वचित्किंचिन्न किंचित्प्रकटयति ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
दूरत्व ओर तटस्थता का वारण करने के लिए (सर्वगम् सर्वम्“ ये दो विशेषण हैं ।
यदि कोई शंका करे कि उसमे विप्रकर्ष ओर तटस्थता क्यो नहीं है, इस पर कहते है-
यह आत्मा है ओर सर्वशक्तिशाली है यानी आत्मा होने से ओर सर्वशक्तिशाली होने से
यह विप्रकर्ष ओर तटस्थता से शून्य हे ।
शंका - यदि वह सवका आत्मा और सर्वशक्तिशाली है तो सबको सर्वत्र प्रकट क्यो नहीं
करेगा?
समाधान - सबको सर्वत्र-प्रकट नहीं करता, क्योकि सर्वशक्तिशाली होने पर भी
कहींपर यानी अन्तःकरणरूप उपाधि में जीवरूप से प्रवेश होने पर चित्शक्ति को प्रकट
करता है, कहीं पर (सात्विक उपाधि में) प्रवेश करने से शान्ति को प्रकट करता है, कहीं
पर (तामस उपाधि में) प्रवेश करने से जड़शक्ति को प्रकट करता है, कहीं पर (राजसोपाधि
में) राग, लोभ आदि वृत्तियों का उल्लास प्रकटता है, कहीं पर कुछ यानी मिश्रित गुणों का
कार्य होने से विशेष रूप से कथन के योग्य प्रकट करता है ओर सुषुप्ति ओर प्रलय में कुछ
भी प्रकट नहीं करता