Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 59, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 59, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सरस्वती तथेत्युक्त्वा तत्रैवान्तर्धिमाययौ ।
प्रभाते पङ्कजैः सार्धं बुबुधे सकलो जनः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, देवी सरस्वती पूर्वोक्त प्रकार से राजा ने जो वर माँगा था,
"उसे ऐसा ही हो” यह कहकर यानी देकर वहीं पर (राजमहल में ही) अन्तघनि को प्राप्त हो
गई तथा प्रातःकाल में कमलों के साथ सब लोग जागे
सर्ग सन्दर्भ
अद्रावनर्वौ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग राजा के जी उठने के हर्ष से नगर ओर अन्तःपुर में उत्सव, जीवन्मुक्त राजा पद्म और दो लीलाओं का चिरकाल तक राज्यभोग और तदुपरान्त मुक्तिका प्रतिपादन ।