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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 59, Verses 2–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 59, verses 2–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 2-9

संस्कृत श्लोक

आलिलिङ्ग च तां लीलां लीला च दयितं क्रमात् । पुनःपुनर्महानन्दान्मृतं प्रोज्जीवितं पुनः ॥ २ ॥ तदासीद्राजसदनं मदमन्मथमन्थरम् । आनन्दमत्तजनतं वाद्यगेयरवाकुलम् ॥ ३ ॥ जयमङ्गलपुण्याहघोषघुंघुमघर्घरम् । तुष्टपुष्टजनापूर्णं राजलोकवृताङ्गणम् ॥ ४ ॥ सिद्धविद्याधरोन्मुक्तपुष्पवर्षसहस्रभृत् । ध्वनन्मृदङ्गमुरजकाहलाशङ्खदुन्दुभि ॥ ५ ॥ ऊर्ध्वीकृतबृहद्धस्तहास्तिकस्तनितोत्कटम् । उत्तालताण्डवस्त्रैणपूर्णाङ्गणलसद्ध्वनि ॥ ६ ॥ मिथःसंघट्टनिपतज्जनोपायनदन्तुरम् । पुष्पशेखरसंभारमयसंसारसुन्दरम् ॥ ७ ॥ विकीर्णापादितक्षौमं मन्त्रिसामन्तनागरैः । स्थूलपद्ममयं व्योम रक्तैस्ताण्डविनीकरैः ॥ ८ ॥ मत्तस्त्रीकन्धरावृत्तलीलान्दोलितकुण्डलम् । प्रवृत्तपादसंपातप्रोल्लसत्पुष्पकर्दमम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा ने उस लीला का बारबार आलिंगन किया और लीला ने भी मरकर फिर वापिस आये हुए राजा का बार-बार बड़े आनन्द से आलिंगन किया । उस समय उस राजमहल का क्या कहना था । उसमें सभी लोग आनन्द मेँ मस्त थे, गाने ओर बाजों की ध्वनि से वह गूँज रहा था, उसमें सभी लोगों में मद ओर काम ने अपना सिक्का जमा रक्खा था। जय-जयकार की ध्वनि और मांगलिक पुण्याहवाचन के घोष से वह मुखरित था, सन्तुष्ट और हृष्टपुष्ट लोगों से भरा था, राजपुरुषो से उसका आँगन ठसाठस भरा रहता था, उस पर सिद्ध ओर विद्याधरो से छोडी गई हजारों पुष्पवृष्टियाँ बरसती थी, वहाँ ढोल, पखावज, काहल (कार्णाल नाम का एक प्रकार का बाजा यानी बड़ा ढोल) शंख ओर नगारे बजते रहते थे, अपनी बड़ी-बड़ी सूँडों को उठाये हुए हाथियों के झुण्ड की चिंघाड से वह भीषण लगता था । उसका आँगन उद्धत नृत्य करनेवाली नर्तकियों से पूर्ण था अतएव उसमें विचित्र ध्वनि हो रही थी । परस्पर एक को दूसरे की टक्कर लगने से राजा के लिए उपहार ला रहे लोगों के उपहार वहाँ पर गिर रहे थे, गिर रहे उपहारो से वह नीचा ऊँचा हो गया था, फूलों की सिर की मालाओं ओर उत्सव के साज-बाजों से भरपूर विविध लोगों के इधर उधर आने जाने से वह बड़ा भला लगता था, मंत्रियों, अधीन राजाओं और नगरवासियों से बिखेरे गये फूलों, मालाओं ओर मोतियों से चारों ओर आच्छन्न होने के कारण ऐसा लगता था, मानों उसे रेशमी वस्त्र पहनाये गये हो, नर्तकियो के लाल-लाल हाथों से, जो आकाश में नाच रहे थे, बड़े-बड़े कमलोंवाले तालाब के सदुश प्रतीत होता था। खूब प्रसन्न (सुखी) स्त्रियों के कानों के कुण्डल, उनके विशेषरूप से गर्दन घुमाने से, झूल रहे थे, इधर उधर चलने-फिरनेवाले लोगों के पैर पड़ने से फूलों का कीचड़ बड़ा भला प्रतीत होता था