Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 44–48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verses 44–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 44-48
संस्कृत श्लोक
मृतिमोहक्षणेनैव यदैतौ दंपती स्थितौ ।
तदैवाभ्यामिदं बुद्धं प्रतिभासवशाद्हृदि ॥ ४४ ॥
आवयोः पितरावेताविमे वै चापि मातरौ ।
देश एष धनं चेदं कर्मेदं पूर्वमीदृशम् ॥ ४५ ॥
आवां विवाहितावेवमेवं नामैकतां गतौ ।
एतयोः सापि जनता याता तत्रैव सत्यताम् ॥ ४६ ॥
तथैवात्रास्ति दृष्टान्तः प्रत्यक्षं स्वप्नवेदनम् ।
इत्येवंभावया लीले लीलयाहमथार्चिता ॥ ४७ ॥
नाहं स्यां विधवेत्येवं वरो दत्तो मयाप्यसौ ।
इत्यर्थेन मृता पूर्वमेवेह खलु बालिका ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
जब इन
दो दम्पतियों का मरणानुकूल मूर्च्छा का क्षण आया, तभी इन्होंने सबका, जो आगे कहा
जायेगा, वासना के जाग्रत् होने के कारण अपनी कल्पना से अनुभव किया कि ये हमारे पिता
है और ये हमारी माताएँ हैं, यह हमारा देश है, यह हमारी धनसम्पति है, यह हमारा कर्म है
और ऐसा कर्म हमने पूर्वजन्म में किया था । इस प्रकार हम लोगों का विवाह हुआ ओर इस
प्रकार हम दोनों एकता को प्राप्त हुए । इनकी वह जनता भी, जो कि कल्पनात्मक ही है,
भोगकर्ता के अदृष्ट से सत्यता को (अर्थक्रियाकारिता को) प्राप्त हुई है, वैसी ही स्वप्नप्रतीति
यहाँ पर प्रत्यक्ष दृष्टान्त हे, स्वाप्निक पुरुष भी स्वप्नकाल में सत्यता को (अर्थक्रियाकारिता
को) प्राप्त होते ही हें । लीले, इस प्रकार के अभिप्राय से युक्त लीला ने मेरी आराधना की
थी कि मैं कभी विधवा न होऊँ और मैंने भी उसे वरदान दिया था । इस कारण वह बालिका
यहाँ पर पहले ही मर गई है