Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 42,43
संस्कृत श्लोक
ब्रह्म सर्वगतं यस्माद्यथा यत्र यदोदितम् ।
भवत्याशु तथा तत्र स्वप्नशक्त्यैव पश्यति ॥ ४२ ॥
सर्वत्र सर्वशक्तित्वाद्यत्र या शक्तिरुन्नयेत् ।
आस्ते तत्र तथा भाति तीव्रसंवेगहेतुतः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि ब्रह्म सर्वव्यापक है, अतएव जब जहाँ पर जैसी वासना
होती है, तब वहाँ पर वह तुरन्त वैसा ही हो जाता है और विक्षेप शक्ति से (वैसा ही) उसका
अनुभव करता हे । ब्रह्म सर्वत्र सम्पूर्ण शक्तियों से युक्त है, अतएव जहाँ पर जिस जिस रूप
से भोक्ता के अदृष्टवश जिस शक्ति का आविर्भाव कराता हे, वहाँ पर वह वैसा ही होता है
ओर दढ आग्रहरूप वासना के कारण वैसी ही उसकी प्रतीति होती हे