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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 25–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । श्रृणु सर्वं समासेन यथापृष्टं वदामि ते । लीले लीलास्ववृत्तान्तमन्तदं दृश्यदुर्दशम् ॥ २५ ॥ पद्मस्तव स भर्तैष भ्रान्तिं तावत्ततामिमाम् । इयं जगन्मयी तस्मिन्नेव सद्मनि पश्यति ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

श्री देवीजी ने कहा : भद्रे, सुनो, जैसे तुमने मुझसे पूछा है, वह सब में संक्षेप से तुमसे कहती हूँ, यह तुम्हारा ही, जो दूसरी लीला बनी हुई हो, वृत्तान्त है, इससे तुमको निश्चय हो जायेगा ओर इससे मरण, परलोकगमन आदि को भी, जिनको देखना कठिन है, तुम देख सकोगी । तुम्हारा पति महाराज पद्म नगर आदि के रूपसे दिखाई दे रही जो यह जगन्मय भ्रान्ति है, खूब विस्तार को प्राप्त हुई इस जगन्मय भ्रान्ति को ही उसी शवगृह में देखता हे