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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 27–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verses 27–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 27-30

संस्कृत श्लोक

भ्रान्तियुद्धमिदं युद्धमेषा भ्रान्तिर्जनोऽजनः । भ्रान्त्यैवास्तीह मरणमेष चैवं भ्रमात्मकः ॥ २७ ॥ भ्रमक्रमेणानेनैव लीलास्य दयिता स्थिता । त्वं चैषा च वरारोहे स्वप्नमात्रं वराङ्गने ॥ २८ ॥ यथा भवत्यावेतस्य स्वप्नमात्रं वराङ्गने । तथा भवत्योर्भर्तैष तथैवाहमपि स्वयम् ॥ २९ ॥ जगच्छोभैवेदृशीयं दृश्यमेतदिहोच्यते । एतदेव परिज्ञातं दृश्यशब्दार्थमुज्प्तति ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

यह जो युद्ध तुमने देखा है, यह स्वप्नयुद्ध के समान भ्रान्तियुद्ध ही था, यह लीला भी, जिसके बारे में तुमने पूछा है, भ्रान्ति ही है, ये जो लोग हैं, वे जन्म आदि विकार से रहित आत्मा ही हैं, यहाँ जो मरण होता है, वह भ्रम ही हे ओर यह संसार भी इस प्रकार भ्रमात्मक ही हे । इसी भ्रम से राजा पद्म की लीला भायरिप से स्थित रही । तुम और वह दोनों सर्वग सुन्दरी ललनाएँ स्वप्नमात्र ही हो जैसे राजा की आप दोनों सुन्दरियाँ स्वप्नमात्र हैँ, वैसे ही आपका पति यह राजा पद्म और स्वयं मैं भी स्वप्नमात्र ही हूँ। भद्रे, यह सम्पूर्ण जगत्‌ की शोभा ऐसी ही (भ्रममात्र ही) है। यहाँ पर यह सब दृश्य भी भ्रान्तिमात्र ही कहा गया है । यदि यह जान लिया जाय, तो पुरुष दृश्य शब्द के अर्थ का (दृश्य में दरष्टा के कर्मत्व का) त्याग कर देता है