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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 23–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 23,24

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । कथमेषा पुरा देवि संपन्ना तत्र देहिनी । कथं च तत्सपत्नीकभावमाप्तवती स्थिता ॥ २३ ॥ ते चास्या वद किं रूपं पश्यन्त्यथ वदन्ति किम् । तद्गेहवरवास्तव्याः समासेनेति मे वद ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

लीला ने कहा : हे देवि, यह लीला वहाँ पर पहले देहधारिणी कैसे हो गई, जिस स्थिति में यह मेरी सौत है, उस स्थिति को प्राप्त होकर यह कैसे स्थित हे । राजा पद्म के राजमहल में रहने वाले लोग इसका कैसा रुप देखते हैं और इसको क्या कहते हैं, यह सब संक्षेप से आप मुझसे किये