Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 1–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतस्मिन्नन्तरे राम लीलोवाच सरस्वतीम् । श्वासावशेषमालोक्य मूढं भर्तारमग्रगम् ॥ १ ॥ प्रवृत्तो देहमुत्स्रष्टुं मद्भर्तायमिहाम्बिके । ज्ञप्तिरुवाच । एवंरूपमहारम्भे संग्रामे राष्ट्रसंभ्रमे ॥ २ ॥ संपन्नेऽपि स्थितेऽप्युच्चैर्विचित्रारम्भमन्थरे । न किंचिदपि संपन्नं राष्ट्रं न च महीतलम् ॥ ३ ॥ न स्थितं क्वचनाप्येव स्वप्नात्मकमिदं जगत् । तस्य तन्मण्डपस्यान्तः शवस्य निकटाम्बरे ॥ ४ ॥ इदं भूराष्ट्रमाभाति भर्तृजीवस्य तेऽनघे । अन्तःपुरगृहान्ते तदिदं राष्ट्रान्वितोदरम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस बीचमें, अपने सामने मृत्युशय्या पर लेटे हुए मूच्छित अपने पति को श्वासमात्रशेष (जिसमें जीवित के चिहो मेँ केवल श्वास ही शेष रह गया था) देखकर देवी सरस्वती से कहा : माँ, यह मेरा पति यहाँ पर देह का त्याग करने के लिए उद्यत हे । श्रीसरस्वतीजी ने कहा : भद्रे, इस प्रकार के महान्‌ उद्योग से परिपूर्ण, राष्ट्र में उथल पुथल मचा देनेवाले, अत्यन्त अद्भुत व्यापारो से भरे हुए इस संग्राम के शुरु होने, चलने ओर समाप्त होने पर कहीं पर न तो राष्ट्र या महीतल कुछ भी रहा और न नष्ट हुआ । इस प्रकार का यह स्वप्नरूप जगत्‌ है । पूर्वोक्त गिरिग्राम के ब्राह्मणगृह के मण्डप के अन्दर रक्खे हुए राजा पद्म के शव के निकटवर्ती मण्डपाकाश मेँ तुम्हारे पति का यह पृथ्वीरूपी राष्ट्र प्रतीत होता है, अन्तःपुर के घर के अन्दर अनेक राष्ट्रों से युक्त यह ब्रह्माण्ड है

सर्ग सन्दर्भ

इक्यावनवाँ सर्ग समाप्त बावनवाँ सर्ग राजा विदूरथ की मृत्यु, संसार की असत्यता ओर उस देश की लीला की वासनारूपता का वर्णन ।