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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 6–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verses 6–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 6-9

संस्कृत श्लोक

वसिष्ठविप्रगेहेऽन्तर्विन्ध्याद्रिग्रामके स्थितम् । वसिष्ठविप्रगेहेन्तः शवगेहजगत्स्थितम् ॥ ६ ॥ शवगेहजगत्कुक्षाविदं गेहजगत्स्थितम् । एवमेष महारम्भो जगत्त्रयमयो भ्रमः ॥ ७ ॥ त्वया मयाऽनयाऽनेन संयुक्तः सार्णवावनिः । गिरिग्रामकदेहान्तर्मध्ये गगनकोशके ॥ ८ ॥ स्वात्मैव कचति व्यर्थो न कचत्येव वा क्वचित् । तत्पदं परमं विद्धि नाशोत्पादविवर्जितम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

रूप भी है ही नहीं । ऐसी अवस्था में निर्विषय चैतन्य ही अवशिष्ट रहता है, वही मुख्य ज्ञातव्य है, इसलिए तुम नाश और उत्पत्ति से शून्य उस परम पद को जानो