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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 51, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 51, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

ववुरलकचयान्विलोलयन्तो मुखकमलालिकुलानि सैन्धवीनाम् । जललववलनाकुलाः समीरा अशिवगुणानिव सर्वतः क्षणेन ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

सिन्धु के देश की सुन्दरियों के मुखरूपी कमल की भ्रमरपंक्तियों के तुल्य अलकों को धीरे धीरे हिला रहे वायु मुखकमल के मधुबिन्दुरूप स्वेदजल के कणों को लेने से मत्त और मन्दगति होने के कारण आकुल होकर उक्त सुन्दरियों के मुखकमलों की शीतलता ओर सुगन्धि आदि मंगलमय गुणों से सम्पूर्ण देश से सन्ताप, दुर्गन्धि आदि अशुभ गुणों को नष्ट करते हुए बहने लगे