Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 10–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, verses 10–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 10-14
संस्कृत श्लोक
शरपातितशूलासिखड्गकुट्टितपट्टिशम् ।
मुसलप्रतनाप्रासशूलशातितशक्तिकम् ॥ १० ॥
शराम्बुराशिमथनमत्तमुद्गरमन्दरम् ।
गदावदनतो युक्तं दुर्वारास्त्रिनिभासिनि ॥ ११ ॥
रिष्टारिष्टप्रशमनभ्रमत्कुन्तेन्दुमण्डलम् ।
प्रासप्रसरसंरब्धप्रोद्यतान्तकृतान्तकम् ॥ १२ ॥
चक्रावकुण्ठितोर्ध्वास्त्रं सर्वायुधक्षयंकरम् ।
शब्दस्फुटद्विरिञ्चाण्डं घातभग्नकुलाचलम् ॥ १३ ॥
धारानिकृत्तशस्त्रौघमस्त्रयोर्युध्यमानयोः ।
मदस्त्रवारणेनेव वज्राविजरपर्वतम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त शस्त्रो की नदियों के ही युद्ध का विस्तारसे वर्णन करते हैं।
उस युद्ध में शर से (वैष्णवास्त्र से अभिमन्त्रित बाण से) निकले हुए शूल, तलवार और
कटार से पट्टिश (किर्च के आकार के एक प्रकार के लोहे के हथियार) चूर चूर हो गये थे,
मूसलों के विस्तार तथा प्रास ओर शूल से शक्तियाँ (शक्ति नाम का शस्त्र) काट कर टुकड़े-
डुकड़े की गईं थी और बाण समूह रूप जलनिधि के मंथन में समर्थ मुद्गर ही मन्दर का काम
कर रहे थे । वहाँ गदाओं के मुखसदृश अग्रभागो से टक्कर लग रही थी तथा जिनके अस्त्रो
का निवारण करना महाकठिन था, उन प्रतियोद्धाओं के अनुरूप प्रमाण और प्रभाववाली
तलवारें थी । उस युद्ध में अपनी-अपनी सेनाओं के विध्वंसरूप अशुभ की शान्ति के लिए
भालेरूपी चन्द्रमण्डल घूम रहे थे, यम वहाँ पर प्रासों के प्रसार से कुपित थे, अतएव उन्होंने
लोगों का क्षय करना आरम्भ कर दिया था । उस युद्ध में चक्रों से ऊपर को खड़े किये गये
अस्त्र-शस्त्र कुण्ठित किये गये थे, सम्पूर्ण आयुधों का क्षय हो रहा था, उसके शब्द से ब्रह्माण्ड
मानों फूटता था, प्रहारों से कुलाचल भी छिन्न-भिन्न हो रहे थे। जैसे मैंने विश्वामित्र के
अस्त्र का निवारण किया था, वैसे ही परस्पर एक दूसरे के घात-प्रतिघात का निवारण
करनेवाले लड़ रहे उन दो वैष्णवास्त्रों की बाणवृष्टि ने सब प्रकार के शस्त्रों के समूह को
काट डाला, वजों ने अकाट्य पर्वतों को काटकर जीर्ण-शीर्ण कर दिया