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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 15–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

शङ्कुशङ्कितसूत्कारकाशिशूलशिलाशतम् । भुशुण्डीनिर्जितोद्दण्डभिन्दिपालोग्रमण्डलम् ॥ १५ ॥ परशूलकराभैकपरशूलैकलम्पितम् । वहदुच्छिन्नचञ्चूरचारणं शत्रुवारणम् ॥ १६ ॥ स्फुटच्चटचटास्फोटरुद्धत्त्रिपथगारयम् । हेत्यस्त्रीचूर्णसंभारमहाधूमवितानकम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर शूल और पत्थर कीलों की नाईं तीक्ष्ण थे, शत्रुभेदन रूप कार्य से उनकी खूब प्रशंसा होती थी और वे तेज दौड़ने से हुई फुफकार से सुशोभित थे । वहाँ भुशुण्डियों ने (एक प्रकार के शस्त्रों ने) भीषण भिन्दपालों के घने ढेर पर विजय पाई थी । सबका संहार करने में समर्थ भगवान्‌ शंकर के तुल्य पराक्रमशाली शिवशूल को उसके तुल्यही दूसरे शूलने कुण्ठित कर डाला था, निकलते ही तुरन्त काटे गये हथियारों की टेढी-मेढी गतियाँ हो रही थी । फूट रहे चट-चट शब्द ने गंगाजी के प्रवाह को रोक दिया था और अस्त्र-शस्त्रों के चूर के ढेर रूपी महान्‌ धूम्र से चँदवा तन गया था