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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 1–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, verses 1–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 1-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । रणे रभसनिर्लूननरवारणदारुणे । अहंपूर्वमहंपूर्वमिति वृन्दानुपातिनि ॥ १ ॥ एते चान्ये च बहवस्तत्र भस्मत्वमागताः । प्रविशन्तः प्रयत्नेन शलभा इव पावके ॥ २ ॥ अत्रान्ये मध्यदेशीया जना नोदाहृता मया । तानिमाञ्छृणु वक्ष्यामि पक्षाँल्लीलामहीभृतः ॥ ३ ॥ तद्देहिकाः शूरसेना गुडा अश्वघनायकाः । उत्तमज्योतिभद्राणि मदमध्यमिकादयः ॥ ४ ॥ सालूकाकोद्यमालास्या दौज्ञेयाः पिप्पलायनाः । माण्डव्याः पाण्डुनगराः सौग्रीवाद्या गुरुग्रहाः ॥ ५ ॥ पारियात्राः कुराष्ट्राश्च यामुनोदुम्बरा अपि । राज्याह्वा उज्जिहानाश्च कालकोटिकमाथुराः ॥ ६ ॥ पाञ्चाला धर्मारण्याश्च तथैवोत्तरदक्षिणाः । पाञ्चालकाः कुरुक्षेत्रास्तथा सारस्वता जनाः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, वेग से काटे गये मनुष्य ओर हाथियों से भीषण रण में, जिसमें सैनिक लोग "पहले मैं पहले मैं” इस होड से झुण्ड के झुण्ड विपक्ष सेना में टूट रहे थे, प्रयत्न से प्रवेश कर रहे पूर्वोक्त ओर उनसे अतिरिक्त भी अनेक लोग अग्नि में प्रवेश कर रहे पतींगों के समान भस्म हो गये । इस युद्ध में दूसरे यानी मध्य देश के लोग मैंने नहीं कहे, लीला के स्वामी के पक्षभूत उन लोगों को मैं कहूँगा, आप सुनिए । वे थे तददेहिक, शूरसेन, गुड, अश्वघनायक, उत्तमज्योतिभद्र, मदमध्यमिकादि, सालूक, अकोद्यमालास्य, दौर्ञेय, पिप्पलायन, माण्डव्य, पाण्डुनगर, सौग्रीवादि, गुरुग्रह, पारियात्र, कुराष्ट्र, यामुन, उदुम्बर, राज्यनामक, उज्जिहान कालकोटिक, माथुर, पांचाल, धमख्य तथा उत्तर ओर दक्षिण पांचालक, कुरुक्षेत्र ओर सारस्वतनिवासी वीर सैनिक गण

सर्ग सन्दर्भ

छतीसर्वों सर्ग समाप्त सैंतीसवाँ सर्ग देशों के नामों के साथ मध्यदेशीय लोगों का तथा उनके जय और पराजय का वर्णन |