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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, Verses 6–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, verses 6–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 6-10

संस्कृत श्लोक

तरत्तरलधाराग्ररेखाङ्कितनभस्तलः । ध्वनत्कणकणाशब्दमध्यलक्षितटांकृतिः ॥ ६ ॥ धीरहुंकारमिश्रोष्मघर्घरारवघस्मरः । प्रवृत्तशरधाराग्रभास्करार्चिर्वितानकः ॥ ७ ॥ नदत्कङ्कटटङ्कारप्रोड्डीनकणपावकः । परस्पराहतिच्छिन्नहेतिखण्डखगाम्बरः ॥ ८ ॥ वीरदोर्द्रुमसंचारवहद्वननभस्थलः । कोदण्डचक्रक्रेङ्कारद्रवद्वैमानिकाङ्गनः ॥ ९ ॥ महाहलहलारावभृङ्गीकृतघनध्वनिः । निर्विकल्पसमाधिस्थ इवैकघनतावशात् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा घमासान युद्ध हुआ कि आकाश में तैर रहे अस्त्र-शस्त्रों की चंचल धार के अग्रभाग से आकाशमण्डल रेखांकित सा प्रतीत होता था, उसमें हो रहे कण-कण शब्द के बीच में धनुषो के टंकार का शब्द सुनाई देता था, वीरोँ के हुंकार से मिलने के कारण अधिकाधिक गम्भीर होता हुआ उसका शब्द ग्रीष्म ऋतु के अन्त के मेघ के गर्जनशब्द को अपने में छिपा देता था, धनुष से छूटी हुई बाणधारा के अग्रभाग में प्रतिबिम्बित सूर्य की किरण उसमें वितान का काम दे रही थी, बाण ओर तलवार के वारो से बज रहे कवचो से टंकार के साथ आग की चिनगारियाँ उडती थी, रण-स्थल के आकाश में परस्पर आघात से छिन्न-भिन्न हुए तलवार आदि शस्त्रो के टुकड़े पक्षियों की भोति उड़ रहे थे, वीरोँ की भूजारूपी वृक्षों के इतस्ततः संचार से युद्ध भूमिका नभस्तल जैसी प्रतीत होती थी, मानों उसमें चलने फिरनेवाले बन घूम रहे हों । उसमें धनुषो की राशियों के टंकार से देवंगनाएँ मारे भय के भाग रही थीं, उसने बड़े भारी कोलाहल शब्द से मेघ के शब्द को भँवरे की गूँजार सा छोटा कर दिया था, जैसे परमात्मभावापन्न होने से निर्विकल्पसमाधि पुरुष बाह्य शब्द आदि का अनुभव नहीं करते है, वैसे ही वह रणसंग्राम भी बाह्य शब्द आदि का अनुभव नहीं करता था, (कहा भी है: योगी समाधि में जब तक बाह्यशब्द आदि का अनुभव करता है तब तक वह सविकल्प समाधि है उसके बाद यानी जब बाह्य शब्द आदि का अनुभव नहीं करता, वह निर्विकल्प समाधि है)