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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, Verses 2–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, verses 2–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 2-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ तत्रैव ते देव्यौ संग्रामं तमवेक्षितुम् । विमाने कल्पिते कान्ते रुद्धे रुरुहतुः स्थिरे ॥ २ ॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र लीलेशः प्रतिपक्षतः । तमुत्सोढुमशक्तः सन्मुखव्यतिकरे रणे ॥ ३ ॥ प्रलयार्णवकल्लोल इवोत्पत्त्योद्भये भटे । जहौ सानाविव शिलां भटस्योरसि मुद्गरम् ॥ ४ ॥ अथ प्रवृत्तः प्रसभं प्रलयार्णवरंहसा । सेनयोः शस्त्रसंपातः किरन्ननलविद्युतः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

रामचन्द्रजी, तदुपरान्त वे देवियाँ उस संग्राम को देखने के लिए वहीं पर रोके गये मन से कल्पित सुन्दर स्थिर विमान पर चढ़ी । इसी बीच में उन दोनों सेनाओं की परस्पर मुठभेड़ होने पर शत्रु की सेना से प्रलयकालीन सागर के कल्लोलकी नाई निर्भय योद्धा निकला । कोई योद्धा पर उसके प्रहार करने की इच्छा करने पर लीला के पूर्वजन्म के पति राजा विदूरथ ने, उसके व्यवहार को सहन करने मे असमर्थ होकर, पर्वत के शिखर पर पत्थर के समान उसकी छाती पर मुद्गर से प्रहार किया । तदुपरान्त दोनों सेनाओं में प्रलयकाल के सागर के वेग से अग्नि की (अग्नि सदृश शस्त्रास्त्रं) ओर बिजली की (बिजली की तरह शस्त्रो की कान्ति की) वृष्टि करता हुआ शस्त्रसंपात होने लगा