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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, Verses 11–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, verses 11–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 11-21

संस्कृत श्लोक

नाराचासारधाराग्रलूनशूरशिरस्करः । परस्परांससंघट्टरणत्कङ्कटसंकटः ॥ ११ ॥ हुंकारहतहेत्युग्रसंघट्टकटुटांकृतः । तरद्धारातरङ्गाभ्रदन्तुराशेषदिङ्मुखः ।। १२ हेतिसंघट्टविक्षोभमुष्टिग्राह्यझणज्झणः । चिरमास्फोटकास्फोटलुठच्चटचटारवः ।। १३ प्रवहत्खड्गसीत्कारज्वलत्कणसणध्वनिः । सरच्छरभराध्वान्तशरत्खरखरारवः ।। १४ धगद्धगितिविच्छिन्नकण्ठोत्थप्राणलोहितः । छिन्नबाहुशिरःखड्गखण्डनिर्विवराम्बरः ।। १५ कङ्कटोत्थस्फुरद्वह्निसटास्पृष्टशिरोरुहः । रणत्पतदसिव्रातमत्तपीनझणज्झणः ।। १६ कुन्तकुण्ठितमातङ्गतरङ्गोत्तुङ्गलोहितः । दन्तिदन्तविनिष्पेषतारचीत्कारकर्कशः ।। १७ महामुसलसंपातपिष्टकष्टोद्धुरस्वरः । तरच्छूरशिरःपद्मप्रकराच्छादिताम्बरः ।। १८ व्योमन्यस्तभुजाहीन्द्रः पूर्णधूलिमयाम्बुदः । छिन्नहेतिनरारब्धकेशाकेशिप्रतिक्रियः ।। १९ नखानखिनिकृत्ताक्षिकर्णनासोष्ठकन्धरः । छिन्नायुधमहामल्लहेलोल्लालनलब्धभूः ।। २० पतत्समदमातङ्गकम्पितोर्वीलुठद्रयः । रणद्रथरयोत्पन्नक्षरद्रक्तसरित्पथः ।। २१

हिन्दी अर्थ

उसमें अर्धचन्द्राकार नोकवाले बाणों की लगातार वृष्टि से शूरवीरों के सिर और हाथ काटे गये थे, परस्पर के कन्धों की टक्कर से बज रहे कवचो से वह युद्धस्थल डरावना था, शस्त्रो के भीषण संघट्ट से उत्पन्न कर्णकट्‌ टकार ध्वनि वीरँ के हकार से मन्द पड़ गई थी - तिरस्कृत हो गई थी, खड्गधारा तरंगरूपी मेघों से उस युद्धभूमि के सभी दिंगमुख दन्तुर से (कुछ ऊँचे से) मालुम पडते थे, उस घमासान युद्ध मेँ तलवार के प्रहार से शत्रु को क्रोध होने पर उसके सर को काटने के लिए प्रवृत्त हुए हाथ को सिर के न मिलने से झग्‌-झग्‌ शब्द मुष्टि में पकड़ने के योग्य-सा होता था, वहाँ पर चिरकाल तक बाहुओं पर ताल ठोंकने वाले शूरवीर लोगों के ताल ठोंकने से चट-चट शब्द मानों गिर पडते थे, वहाँ पर शीघ्रता से म्यान से निकल रही तलवारों का लोहे की म्यान के संघर्षं से उत्पन्न हुए सीत्कार शब्द से युक्त जल रहे स्फुल्लिगों की सण्‌ सण्‌ ध्वनि होती थी, तेजी से लक्ष्यदेश की ओर जा रहे लक्ष्य देश में जाकर फैलनेवाले शरोंकी उसमें खर-खर ध्वनि हो रही थी, वीरों के कटे हुए कण्ठों से धग्‌ धग्‌ शब्द के साथ प्राण ओर और खून निकल रहा था, कटे हुए बाहुओं, सिरों और तलवार के टुकुड़ों से आकाश पट गया था, कवच में टक्कर लगने से निर्गत दीप्त अग्नि की जटातुल्य ज्वालाएँ वीरों के केशों का स्पर्श कर रही थी, परस्पर टक्कर लगने से बज रही और कटकर गिर रहीं तलवारों का जो झण-झण शब्द हो रहा था, उसने शूरों के चित्त को प्रफुल्लित और शरीर को रणोत्साह से दुगना बना दिया था, बर्च्छा से छिन्‍न-भिन्‍न हाथियों की देह से उत्तरंगित रक्त प्रवाह बहता था, हाथियों के दतां के टूटने से हुए दीर्घतम चीत्कारशब्द से वह अत्यन्त भीषण प्रतीत होता था, मूसल के प्रहारसे चूर-चूर हुए लोगों की कष्टमय कातर हाहाकार ध्वनि हो रही थी, कटकर आकाश में तैर रहे शूरों के सिर रूपी पद्मों के समूह से आकाश बिलकुल आच्छन्न था, कटकर आकाश में फेंकी गयीं वीरभुजाएँ ही उसमें सर्पराज थे और चारों ओर आच्छन्न धूलिमय ही मेघ थे, जिनके अस्त्र-शस्त्र कट गये थे, ऐसे पुरूषों द्वारा अस्त्र-शस्त्र के काटने का बदला चुकाने के लिए केशाकेशि युद्ध हो रहे थे, परस्पर द्वारा परस्पर के नखों से आँखें, नाक, कान, ओठ और कन्धे नोचे जा रहे थे, जिन महामल्लो के अस्त्र कट चुके थे, वे क्रीड़ापूर्वक बाहुयुद्ध से विजय प्राप्त कर रहे थे, श्रो की चोट से गिर रहे मदोन्मत्त हाथियोंसे कंपाये गये घायल होने के कारण दौड़ने में असमर्थ लोग पृथिवी में वेग से लोट रहे थे, शब्दायमान रथ के वेग से बने हुए मार्गो में क्षत-विक्षत योद्धाओं के शरीर से निकल रहे खून की नदी बह रही थी