Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, Verses 30–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, verses 30–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 30-40
संस्कृत श्लोक
खड्गर्ष्टिवृष्टिसंपुष्टराजपूजितसैनिकः ।
शूलोत्तम्भितसच्छूरग्रहणोद्यमिताप्सराः ।। ३०
गदातुषारविगलत्स्फुरिताङ्गददिङ्मुखः ।
प्रासप्रसभसंपिष्टकष्टचेष्टतयोत्कटः ।। ३१
चक्रक्रकचसंचारच्छिन्नाश्वनरवारणः ।
परशुव्रातसंपातपतत्समदवारणः ।। ३२
लकुटोल्लोडनोड्डीनप्रोड्डामरचटद्भटः ।
यन्त्रपाषाणसंपातपिष्टकेतुरथद्रुमः ।। ३३
करवालविलूनाग्रच्छत्रपङ्कजपाण्डुरः ।
क्षेपणक्षोभसंक्षीणसैन्यक्षोभोऽप्यलक्षणः ।। ३४
कबन्धबन्धसंनेतृपातसंपिष्टपार्श्वगः ।
साङ्कुशाङ्कितसंख्यस्थवीरवारितवारणः ।। ३५
परशुव्रातसंपातपतत्समदवारणः ।
पाशाप्राशिविशेषज्ञवीरातिपरिदेवनः ।। ३६
क्षुरिकाकुक्षिनिर्भेदगलत्पद्मपतज्जनः ।
त्रिशूलवलनोन्मत्तशूवरसंकरनर्ततः ।। ३७
धावद्धानुष्कसंपूर्णकुलकूजितकाकलिः ।
भिन्दिपालसटाटोपहुंकारारभटीनटः ।। ३८
वज्रमुष्टिविनिष्पिष्टपिष्टसद्भटसंकटः ।
श्येनवद्व्योमपदवीप्रोत्पतत्पटुपट्टिशः ।। ३९
अङ्कुशाकृष्टशूरेशरथेभहयकेतनः ।
हलाहलिहतालूनहेलाकुलकुलाचलः ।। ४०
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर अपने सैनिकों की तलवार ओर छूरियों की कुशल वृष्टि से सन्तुष्ट
हुए राजाओं द्वारा उनका सम्मान किया जा रहा था, शूलों पर टँगे हुए अच्छे अच्छे शूरों को
ग्रहण करने के लिए अप्सराएँ उद्यमशील थी, हिमवृष्टि से गल रहे कमलों के तुल्य गदाओं
के गिरने से योद्धाओं के मुँह गिर रहे थे, भालों से जबरन् कुचल दिये गये योद्धाओं की दुःखप्रद
चेष्टाओं से भीषण दृश्य हो रहा था, चक्रों ओर आरों के प्रहार से घोड़े, मनुष्य और हाथी
छिन्न भिन्न किये गये थे, अनेक कुल्हाडो के वारों से मदोन्मत्त हाथियोंका समूह गिर रहा
था । वहाँ पर बड़ी-बड़ी लट्टियोंसे गौओं की भाँति हाँकने से कोई योद्धा छिप गये थे, कोई
भाग रहे थे, तथा वृक्ष, भीत ओर ढालसे अपने को ओझल कर रहे थे, क्षेपणीयन्त्र से फेंके
गये पत्थरों से रथों और वृक्षों में लगी हुई पताकाएँ चूरचूर हो गई थी, तलवार से जिनके
दण्ड काटे गये थे ऐसे छत्रो ओर वीरोंके कर्णाभरण रूप कमलों से सारा रणस्थल सफेद था,
अस्त्रों के क्षेपणजनित क्षोभ से सेन्यक्षोभ शान्त हो गया था, सैनिकों के क्षोभ की वहाँ कोई
गिनती नहीं थी, कबन्धों के (सिर कटने पर भी चलनेवाले धड़ों के) आलिंगनों से जीवित
रथ नायकों के गिरने से नियन्त्रण न होने के कारण बे राह चलनेवाले रथ आदि से आसपास
चलनेवाले अनेक योद्धा पीसे जा रहे थे, अंकुशयुक्त महावतों के अंकुश के आघात से आहत
होने पर भी युद्ध में प्रहार करनेवाले वीर हाथियों को भगा रहे थे, कुल्हाड़ों के वार से मदोन्मत्त
असंख्य हाथी गिर रहे थे, पाशों के युद्ध में विशारद वीर चारों ओर अपने प्राणों की बाजी
लगा रहे थे, छूरों से पेट को काटने के कारण हृदयकमल गिर रहे थे और योद्धा धराशायी हो
रहे थे, त्रिशूलों के बल से उन्मत्त शूरवीर प्रबल योद्धा नाच कर रहे थे, दौड़ रहे धनुर्धारियों
के सम्पूर्ण दल अस्फूट और मधुर गीत गा रहे थे, भिन्दिवाल के अयालों के आडम्बर और
अहंकारपूर्ण वचनों से वहाँ पर नट नृसिंहवेष का अनुकरण कर रहे थे, मल्ल लोगों की
वज़मुष्टि से पीसे गये अन्य योद्धाओं का वहाँ पर तांता लगा था, सुन्दर पट्धिश आकाशमार्ग
में बाज की नाईं उड़ रहे थे, शूर पुरुषों के रथों, हाथियों और घोड़ों की पताकाएँ अंकुशों से
खींची जा रही थी, शत्रुओं के बीच में अचल रहने वाले शूरवीर योद्धा हलों द्वारा किये जा रहे
युद्ध में मारे गये और काटे गए लोगों की अवहेलना करने में व्यग्र थे