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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, Verses 41–47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, verses 41–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 41-47

संस्कृत श्लोक

सुतालोत्तालकुद्दालनिखातवनभूतलः । धनुर्द्विगुणमात्रास्तलूनलोकशिलावलिः ।। ४१ क्रकचोभयपार्श्वेभच्छिन्नमत्तमतङ्गजः । संग्रामोलूखलक्षुण्णलोकतण्डुलमौसली ।। ४२ अस्त्राभाशृङ्खलाजालबद्धसेनाविहङ्गमः । लोलासिवीरनिस्त्रिंशनीतवादिगृहाङ्गणाः ।। ४३ गणशो नीयमानाग्र्यश्वापदारावनिर्भरः । नखाङ्गुष्ठखनत्पुङ्खप्रेङ्खारणरणारवैः ।। ४४ मरिचैर्व्यञ्जनानीव रञ्जयन्सकलारवान् । सैन्यनिक्षिप्तकुम्भाग्निदग्धयोधेरितायुधः । सैन्यनिक्षिप्तकुम्भाग्निदग्धयोधोज्झितायुधः ।। ४५ सैन्यनिक्षिप्तकुम्भस्थतप्ताङ्गारहतेक्षणः । सैन्यनिक्षिप्तकुम्भस्थविषवारिदलज्जनः ।। ४६ नाराचवर्षवरवारिदवीरपूर- मत्ताभ्रसंभ्रमसनृत्तकबन्धबर्ही । कल्पान्तकाल इव वेगविवर्तमान- मातङ्गशैलवलितो रणसंभ्रमोऽभूत् ।। ४७

हिन्दी अर्थ

बड़े-बड़े ताड के वृक्षों के समान ऊँचे पुरुषों से, जो कि हाथ में कुदाली लिए थे, वनभूमियाँ खोदी गई और सम की गई थी, जहाँ तक बाण फेंका जा सकता है, उससे केवल दूने प्रदेश में युद्ध संचार के सुभीते के लिए लोग हटा दिये गये थे, चट्टानों की पंक्तियाँ काट छाँटकर बराबर कर दी गई थी। आरों के दोनों बगलों से मत्त मातंग काट डाले गये थे, संग्रामरूपी ऊखलमूसल से योद्धारूपी धानों को कूटनेवाले मुसलयुद्ध प्रवृत था । वहाँ अस्त्रो की कान्ति की श्रृंखलारूप जाल में सेनारूपी पक्षी फाँसे गये थे, चंचल तलवार को हाथ में लिए हुए वीरों की तलवारों से वे वैवस्वत के यानी यमराज के घरों में पहुँचाये गये थे, अर्थात्‌ यम ही व्याधों का राजा है, यदि ऐसा न होता तो सेनारूप पक्षी उसके आँगन में क्यों पहुँचाए जाते । युद्धभूमि में गिरे हुए श्रेष्ठ योद्धाओं को गणशः ले जा रहे व्याघ्र आदि हिंसक जीवों के घोर गर्जन से रण-स्थल पूर्ण था, नख जिसमें प्रधान हैं, ऐसे अंगुष्ठों से निकाले जा रहे बाणों के वेग के रण रण शब्दों से, जैसे मिर्च से चटनी मे जायका आ जाता है वैसे ही, अन्य सम्पूर्ण शब्द रंजित हो रहे थे, सैनिकों द्वारा घड़े में भरकर फेंकी गई अग्नि से तनिक जले हुए प्रतिपक्ष के योद्धा शस्त्र-अस्त्र तानकर खड़े हो रहे थे और प्रति-पक्ष के सैनिकों द्वारा फेंकी गई उक्त अग्नि से अधिक जल जाने के कारण योद्धा अशक्ति से शस्त्र त्याग कर रहे थे, प्रतिपक्ष सैनिकों द्वारा घड़े में रखकर छोड़े गये तपे हुए अंगारों से योद्धाओं की आँखें जाती है उक्त सैनिकों द्वारा छोड़े गये घड़े में स्थित विषमिश्रित जल से योद्धा गिर रहे थे । लोहे के बाणों की वृष्टि रूप सुन्दर जल को वषनि वाले वीरसंघरूपी मतवाले मेघों के विलास से कबन्धरूपी मयूर जिसमें नाच करते थे और वेग से घूम रहे मत्त मातंगरूपी पर्वतों से परिवेष्टित वह संग्राम-संघर्ष प्रलयकाल के सदृश हुआ