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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, Verses 28–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

सैन्यव्याकुलवेतालललनोन्मुक्तमुद्गरः । गगनोत्तम्भितोत्तुङ्गशूरतोमरतोरणः ।। २८ भुशुण्डीभग्नखड्गौघखण्डालीव्योमकुन्तलः । कुन्तवेणुवनन्यस्ततापाम्बरकचच्छविः ।। २९

हिन्दी अर्थ

वहाँ सेनादर्शन से व्याकुल हुई वेतालों की स्त्रियँ मुद्गर छोड रही थी, आकाश में ऊँचे उठाये हुए शूरवीरों के तोमर (गँड़ासे) तोरणमाला से प्रतीत होते थे, भुशुण्डी से छिन्नभिन्न तलवरों के टुकड़ों का समूह आकाश का केशजाल सा मालूम होता था, वहाँ पर दैदीप्यमान भालों की छवि भालों के समूहरूप वेणुवन में छोड़ी हुई वनाग्नि के सदृश आकाश में चमक रही थी