Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, Verses 22–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 33, verses 22–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 22-27
संस्कृत श्लोक
रजोरचितनीहारः कचत्प्रवहदायुधः ।
एकीकृतघनक्षोभसैन्यसागरगर्जितः ।। २२
मत्तहासविलासेन मृत्युना परिचर्वितः ।
गर्विताद्रीन्द्रनागेन्द्रखर्विताम्भोदगर्जितः ।। २३
वृक्षश्वभ्रतटीच्छन्नचक्रशक्त्यृष्टिमुद्गरः ।
शरोर्णातन्तुनीरन्ध्रघृष्टियोधाद्रिमेखलः ।। २४
मेघविश्रान्तविच्छिन्नपताकापटचामरः ।
यन्त्रपाषाणचक्रौघदूरविद्रुतखेचरः ।। २५
मरणव्यग्रकृत्ताङ्गयोधाक्रन्दातिघर्घरः ।
कुठाराघातसंघातविदलन्मस्तकव्रजः ।। २६
दूरोड्डीनकचत्खड्गखण्डतारकिताम्बरः ।
शक्तिनिर्मुक्तशक्त्यौघविभिन्नेभावृतावनिः ।। २७
हिन्दी अर्थ
चतुरंगिणी सेना के संचलन से उड़ी हुई
धूली से वहाँ पर चारों ओर कुहरा छा गया था, चमचमा रहे अस्त्र-शस्त्र चल रहे थे, एकत्रित
प्रचुर कोपयुक्त सेनारूपी सागर का प्रतिक्षण गर्जन हो रहा था, उन्मत्त हास और विलासवाले
काल से असंख्य योद्धा चबाए जा रहे थे, मदोन्मत्त पर्वत तुल्य विशालकाय गजराजों ने अपने
गर्जन के सामने सागर के गर्जन को तुच्छ बना दिया था, वहाँ वृक्ष, गर्त और तटोंके सहारे
शत्रुओं पर वार कर रहे लोगों को मारने के लिए छोड़े गये शक्ति, तलवार और मुद्गर वृक्ष,
गर्तं आदि में रुक जाते थे, योद्धारूपी पर्वत के मध्यभाग बाणरूपी मकड़ी के जालों से निरन्तर
गूँथे हुए थे, मेघों के आक्रमणों से या मेघो में विश्रान्त बिजली आदि से पताकाओं के वस्त्र
ओर चँवर छिन्नभिन्न हो गये थे, वहाँ पर क्षेपणीयन्त्रों से (एक प्रकार के गुलेलोंसे) फेंके
गये पत्थरों और चक्रों से पक्षी आदि आकाशचारी बहुत दूर भाग गये थे, मरने के लिए छटपटा
रहे क्षतविक्षत शरीर (बुरी तरह घायल) योद्धाओं के कराहने से वहाँ तेज घर घर शब्द हो
रहा था, कुठारों के आघातों से योद्धाओं के मस्तक कट रहे थे, बहुत ऊँचे आकाश में उड़े
हुए चमचमा रहे खङ्गो के टुकड़ों से आकाश तारों से भरा प्रतीत होता था, पूरे बल से छोड़े
गये शक्ति नामक आयुधों के संघात से काटे गये हाथियों से भूमि पट गई थी