Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, Verses 1–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, verses 1–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 1-22
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमाकलयन्त्यौ ये निर्गत्य जगतो निजात् ।
अन्तःपुरं ददृशतुर्झटित्येव विनिर्गते ॥ १ ॥
स्थितपुष्पभरापूर्णमहाराजमहाशवम् ।
शवपार्श्वोपविष्टान्तश्चित्तलीलाशरीरकम् ॥ २ ॥
घनरात्रितयाल्पाल्पमहानिद्राजनाकुलम् ।
धूपचन्दनकर्पूरकुङ्कुमामोदमन्थरम् ॥ ३ ॥
तमालोक्यापरं भर्तुः संसारं गन्तुमादृता ।
पपात लीला संकल्पदेहेनात्रैव तन्नभः ॥ ४ ॥
विवेश भर्तुः संकल्पसंसारं किंचिदाततम् ।
संसारावरणं भित्त्वा भित्त्वा ब्रह्माण्डकर्परम् ॥ ५ ॥
प्राप सार्धं तया देव्या पुनरावरणान्वितम् ।
ब्रह्माण्डमण्डपं स्फारं तं प्रविश्य तथा जवात् ॥ ६ ॥
ददर्श भर्तुः संकल्पजगज्जम्बालपल्वलम् ।
सिंहीव शैलकुहरं तमो जलदपङ्किलम् ॥ ७ ॥
देव्यो विविशतुस्तत्ते व्योम व्योमात्मिके जगत् ।
ब्रह्माण्डेऽन्तर्यथा पक्वं मृदुबिल्वं पिपीलिके ॥ ८ ॥
तत्र लोकान्तराण्यद्रीनन्तरिक्षमतीत्य ते ।
प्रापतुर्भूतलं शैलमण्डलाम्भोधिसंकुलम् ॥ ९ ॥
मेरुणालंकृतं जम्बुद्वीपं नवदलोदरम् ।
गत्वाथ भारते वर्षे लीलानाथस्य मण्डलम् ॥ १० ॥
एतस्मिन्नन्तरे तस्मिन्मण्डले मण्डितावनौ ।
चक्रेऽवस्कन्दनं कश्चित्सामन्तोद्रिक्तभूमिपः ॥ ११ ॥
तेन संग्रामसंरम्भे प्रेक्षार्थं समुपागतैः ।
त्रैलोक्यभूतैस्तद्व्योम बभूवात्यन्तसंकटम् ॥ १२ ॥
अशङ्कितागते तत्ते देव्यौ ददृशतुर्नभः ।
नभश्चरगणाक्रान्तमम्बुदैरिव मालितम् ॥ १३ ॥
सिद्धचारणगन्धर्वगणविद्याधरान्वितम् ।
शूरग्रहणसंरब्धस्वर्गलोकाप्सरोवृतम् ॥ १४ ॥
रक्तमांसोन्मुखोन्मत्तभूतरक्षःपिशाचकम् ।
पुष्पवृष्टिभिरापूर्णहस्तविद्याधराङ्गनम् ॥ १५ ॥
वेतालयक्षकूश्माण्डैर्द्वन्द्वालोकनसादरैः ।
आयुधापातरक्षार्थं गृहीताद्रितटैर्वृतम् ॥ १६ ॥
अस्त्रमार्गनभोभागविद्रवद्भूतमण्डलम् ।
आहोपुरुषिकाक्षुब्धप्रेक्षकामोदनोद्भटम् ॥ १७ ॥
आसन्नभीमसंग्रामकिंवदन्तीपरस्परम् ।
लीलाहासविलासोत्कसुन्दरीधृतचामरम् ॥ १८ ॥
धर्माप्रेक्ष्यप्रयुक्ताग्र्यमुनिस्वस्त्ययनस्तवम् ।
संपन्नानेकलोकेशवनितावसरस्तवम् ॥ १९ ॥
स्वर्गार्हशूरानयनव्यग्रेन्द्रभटभासुरम् ।
शूरार्थालंकृतोत्तुङ्गलोकपालाख्यवारणम् ॥ २० ॥
आगच्छच्छूरसन्मानोन्मुखगन्धर्वचारणम् ।
शूरोन्मुखामरस्त्रैणकटाक्षेक्षितसद्भटम् ॥ २१ ॥
वीरदोर्दण्डकाश्लेषलम्पटस्त्रीगणाकरम् ।
शुक्लेन शूरयशसा चन्द्रीकृतदिवाकरम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
निकटवर्ती भीषण संग्राम की चर्चा कर रहे थे, क्रीडा में हास ओर विलासं मे उत्कण्ठित सुन्दरियों
ने अपने हाथों में चँवर ले रक्खे थे । अत्यन्त धर्मात्मा होने से अन्य लोगों के दृष्टिगोचर न हो
सकने वाले योगबल से श्रेष्ठ मुनियो द्वारा देवताओं के स्तोत्र जगत् की शान्ति के लिए वहाँ पढ़े
जा रहे थे, अनेक लोकपालों द्वारा अप्सराओं से सम्बन्ध रखनेवाली अवसरोचित स्तुतिर्यो की
जा रही थी, भाव यह कि अप्सराएँ हमें छोडकर नूतन योग्य कान्तो का अनुसरण न करे, यों
लोकपाल उनकी स्तुति कर रहे थे । स्वर्ग में स्थान पाने योग्य शूरवीर पुरुषों को लाने में व्यग्र
इन्द्र के योद्धाओं से वह चमक रहा था, उसमें शूरवीर पुरुषों के लिए ऊँचे ऊँचे लोकपाल
नामक यानी एेरावत आदि हाथी सजाए गये थे, स्वर्ग की ओर आ रहे रणभूमि में आहत शूरो के
आगत-स्वागत रूप सम्मान में गन्धर्व ओर चारण कटिवद्ध थे, वहाँ शूरवीर पुरुषों पर आकृष्ट
होनेवाली अप्सराएँ कटाक्षो से अच्छे-अच्छे योद्धाओं को देखती थी, वह वीर पुरूषों के बाहु-
दण्डों का आलिंगन करने में क्षुब्ध सहस्त्रों स्त्रियोंसे भरा था, शूर पुरुषों के शुभ्र यश ने वहाँ पर
सूर्य को चन्द्रमा बना दिया था, भाव यह कि यश की शीतलता से उष्णता के दब जाने से सूर्य
चन्द्र सा मालूम होता था