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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवञ्छूरशब्देन कीदृशः प्रोच्यते भटः । स्वर्गालंकरण कः स्यात्को वा डिम्भाहवो भवेत् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रसंगवश शूर आदि के लक्षण को जानने की इच्छा से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, शूर शब्द कैसे योद्धा का वाचक है ? कौन योद्धा स्वर्ग का अलंकार है ओर कौन डिम्भाहव योद्धा है ? यद्यपि यहाँ पर डिम्भाहव योद्धा कहीं पर न तो उक्त ही ओर न किसी प्रकार सूचित ही है तथापि यहाँ पर उसके लक्षण के प्रश्न को, स्वर्ग के अलंकार रूपी शूर से भिन्न होने के कारण, प्रासंगिक जानना चाहिए