Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
तैक्ष्ण्यं यथा मरिचबीजकणे स्थितं स्वं स्तम्भेषु चारचितपुत्रकजालमन्तः ।
दृश्यं त्वनन्यदिदमेवमजेऽस्ति शान्तं तस्यास्तिबन्धनविमोक्षदृशः कुतः काः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मिर्चे के बीज के किनके में विद्यमान तीक्ष्णता डण्ठलों में अपने स्वरूप को
व्यक्त किये बिना ही भीतर स्थित है, वैसे ही जिस अज में स्वरूपभूत यह सम्पूर्ण विश्व
उसकी सत्ता से ही विद्यमान है, उस आत्मा में बन्धन और मोक्ष दृष्टि कहाँ से होगी और
कैसे होगी ? यानी किस निमित्त से होगी और स्वरूपतः कैसे होगी ? वे सर्वथा असंभावित
हैं, यह भाव है