Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
भुक्तेऽप्यभुक्तधीर्दृष्टमित्यलङ्कितवादिषु ।
शून्यमाकीर्णतामेति तुल्यं व्यसनमुत्सवैः ।
विप्रलम्भोऽपि लाभश्च मदस्वप्नादिसंविदि ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्या से केवल असरत्-प्रतीति ही नहीं होती, किन्तु सत् से विपरीत भान होना भी
प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं।
नशे में और स्वप्न में रिक्त स्थान भी समृद्ध-सा यानी लोगों की भीड़ से ठसाठस भरा
हुआ प्रतीत होता है, विपत्ति उत्सव के सदृश मालूम होती है और वंचना भी लाभ ज्ञात होती
है