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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verses 49–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, verses 49–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 49-52

संस्कृत श्लोक

एषा माता पिता ह्येष बालोऽभूवमहं त्विति । नानुभूतोऽनुभूतो वा यः स्यात्स्मृतिमयः क्रमः ॥ ४९ ॥ पश्चादुदेत्यसौ तस्य पुष्पस्येव फलोदयः । निमिषेणैव मे कल्पो गत इत्यनुभूयते ॥ ५० ॥ रात्रिर्द्वादशवर्षाणि हरिश्चन्द्रे तथा ह्यभूत् । कान्ताविरहिणामेकं वासरं वत्सरायते ॥ ५१ ॥ मृतो जातोऽहमन्यो मे पितेति स्वप्नतास्विव । अभुक्तस्यैव भोगस्य भुक्तधीरुपजायते ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह मेरी माता है, यह पिता है, मैं बालक हुआ इत्यादि अनुभूत या अननुभूत जो स्मृतिमय क्रम है, वह इसके बाद उत्पन्न होता है, जैसे कि फूल के बाद फल का उदय होता है । ओर एक ही पलक में मेरा कल्प बीत गया, ऐसा अनुभव करता है । राजा हरिश्चन्द्र की एक रात बारह वर्ष की हुई थी, स्त्रीवियोगी पुरुषों को एक दिन वर्ष के समान मालूम होता हे । जैसे स्वप्न में मैं मरा, उत्पन्न हुआ, यह दूसरा मेरा पिता हे, ऐसी प्रतीति होती है, वैसे ही लोक में भी मैं मरा, पुनः उत्पन्न हुआ, यह मेरा पिता हे, जिस भोग का भोग नहीं किया, उसको मेने भोग लिया, ऐसी बुद्धि ओर भुक्त भोगों में मेने इनका भोग नहीं किया, ऐसी प्रतीति मुग्ध लोगों में देखी जाती हे