Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verses 8–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verses 8–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 8-13
संस्कृत श्लोक
यथा सौवर्णकटके दृश्यमानमिदं स्फुटम् ।
कटकत्वं तु नैवास्ति जगत्त्वं न तथा परे ॥ ८ ॥
आकाशे च यथा नास्तिशून्यत्वं व्यतिरेकवत् ।
जगत्त्वं ब्रह्मणि तथा नास्त्येवाप्युपलब्धिमत् ॥ ९ ॥
कज्जलान्न यथा कार्ष्ण्यं शैत्यं च न यथा हिमात् ।
पृथगेवं भवेद्बुद्धं जगन्नास्ति परे पदे ॥ १० ॥
यथा शैत्यं न शशिनो न हिमाद्व्यतिरिच्यते ।
ब्रह्मणो न तथा सर्गो विद्यते व्यतिरेकवान् ॥ ११ ॥
मरुनद्यां यथा तोयं द्वितीयेन्दौ यथेन्दुता ।
नास्त्येवेह जगन्नाम दृष्टमप्यमलात्मनि ॥ १२ ॥
आदावेव हि यन्नास्ति कारणासंभवात्स्वयम् ।
वर्तमानेऽपि तन्नास्ति नाशः स्यात्तत्र कीदृशः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उपमेय कोटि में प्रविष्ट जिन किन््हीं पदार्थो से उसको जो उपमा दी जाती है वह
अनन्वयालंकार का उदाहण है, वैसे ही आपकी यह उक्ति भी है ।
गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः । रामरावणयार्युद्धं रामरावणयोरिव ॥
यह उक्ति इनका कोई उपमान ही नहीं है इस प्रकार अनुपमत्व में पर्यवसित होती है वैसे
ही आपका यह कथन भी अनुपमत्व में पर्यवसित होगा, इसलिए वन्ध्यापुत्र ओर आकाशवृक्ष
के विकल्परूप ज्ञान को दृष्टान्त मानना ठीक नहीं है। अतः यह सिद्ध हुआ कि जगत् की पृथक्
सत्ता मेरे द्वारा कही गई वन्ध्यापुत्र की सत्ता के समान ही है। दूसरी बात जो आपने यह कही है
कि असत् दृष्टान्त भी नहीं हो सकता है इस पर सुनिए, असत् यद्यपि सत् का दृृष्टान्त नहीं
देखा जाता फिर भी उसके असरत् के दृष्टान्त होने में कोड विरोध नहीं है, क्योकि वन्ध्यापुत्रके
समान आकाशपुष्प असत् है, ऐसे प्रयोग देखे जाते हैं। जिसका प्रत्यक्षरूप से अनुभव हो रहा
है, उसकी असत्ता कैसे ? ऐसी शंका कर प्रत्यक्षसे प्रतीत हो रहे पदार्थकी भी, विचार करनेपर
बाध देखने से, असत्ता बहुत से दृष्टान्तो में प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं।
जैसे सुवर्ण के कड़े में स्पष्टतः भली भाँति दिखाई दे रहा भी कटकत्व नामका कोई पदार्थ
नहीं है, वैसे ही प्रत्यक्षतः अनुभूयमान भी यह जगत् परमें (ब्रह्म में) नहीं है । जैसे आकाश में
उपलम्यमान शून्यत्व आकाश से भिन्न नहीं हे, वैसे ही ब्रह्म में प्रत्यक्षतः उपलम्यमान भी यह
जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं है । जैसे काजल से कालिमा पृथक् ज्ञात नहीं होती, हिम से शीतलता
पृथक् ज्ञात नहीं होती वैसे ही परम पदमें (ब्रह्म मेँ) पृथक् गृहीत होनेवाला जगत् नहीं हे । जैसे
शीतलता चन्द्रमा से ओर हिम से (बरफ से) पृथक् नहीं होती वैसे ही ब्रह्म से भी यह जगत्
पृथक् नहीं हे । जैसे मरूभूमि में प्रतीयमान नदी में जल नहीं हे, अथवा जैसे प्रतीयमान द्वितीय
चन्द्रमा में चन्द्रत्व नहीं है, वैसे ही सर्वविध मलों से रहित ब्रह्म मे अनुभूयमान जगत् भी नहीं
हे । कारण के न रहने से जो स्वयं पहले भी नहीं था, वह वर्तमान काल में भी नहीं हे, अतः
उसका नाश ही कैसा ?