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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तुल्यस्यातुलदुःस्थस्य भावकैः किल तोलनम् । निरन्वया यथैवोक्तिर्जगत्सत्ता तथैव हि ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

वन्ध्यापुत्र ओर आकाशवृक्ष का ज्ञान (विकल्परूप) उपमान हो सकता यदि वह उपमेयरूप जगत्‌ के बीच में पड़ा होता । उपमेयरूप जगत्‌ के मध्यपतित होने पर वह उपमान नहीं हो सकता । इसलिए अपारमार्थेक सत्तावाले जगत्‌ का मेरे द्वारा दिया गया ही उपमान ठीक है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी ने उत्तर दिया - दृश्य किसी अन्य पदार्थ के साथ तुलना (उपमा) करने की इच्छा तो है पर उपमेयभूत दृश्य पदार्थ से अतिरिक्त उपमान न मिलने के कारण उसकी किसीसे उपमा ही नहीं की जा सकती