Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
वन्ध्यापुत्रव्योमवने यथा न स्तः कदाचन ।
जगदाद्यखिलं दृश्यं तथा नास्ति कदाचन ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
तात्कालिक सत्ता, भविष्यत्कालिकसत्ता ओर प्रत्यक्षवेद्यता भी उक्त वन्ध्यापुत्र ओर
आकाशवन मे नहीं है, अतः जगत् और उनमें विषमता है । उनके प्रतियोगी की सत्ता प्रसिद्ध
नहीं है, अतः उनकी नास्तिता भी नहीं कही जा सकती यह भाव है । ठीक है, किन्तु जगत्
की भी तो न वर्तमानकालिक सत्ता है, न भविष्यत्कालिक सत्ता है ओर न वह दृश्य ही है,
इस प्रकार जगत् का वन्ध्यापुत्र ओर आकाशवन के साथ साद्रश्य है, इस आशय से
श्रीवसिष्टजी बोले :
वत्स, जैसे वन्ध्यापुत्र ओर आकाशवन की त्रैकालिक सत्ता नहीं है वैसे ही इस सम्पूर्ण
जगत् आदि दृश्य की भी त्रैकालिक सत्ता नहीं हे