Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
एवं चेत्तत्कथं ब्रह्मन्सुघनप्रत्ययं वद ।
इदं दृश्यविषं जातमसत्स्वप्नानुभूतिवत् ॥ २१ ॥
सति दृश्ये किल द्रष्टा सति द्रष्टरि दृश्यता ।
एकसत्त्वे द्वयोर्बन्धो मुक्तिरेकक्षये द्वयोः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् की जो प्रतीति हो रही है, यह बड़ी दृढ़ है और स्वप्न की प्रतीति पूर्णङूप से अभिव्यक्त
न होने के कारण कोमल (अदृढ) है, अतः दोनें मे आकाश-पाताल का अन्तर है और दूसरी
यह बात भी विचारणीय है कि द्रष्टा ओर दृश्य का सम्बन्ध स्वाभाविक है, अतः उसका निवारण
होना कठिन ही नहीं, प्रत्युत असम्भव है, अतः मुक्तिका सम्भव ही नहीं है, यों श्रीरामचन्द्रजी
शंका करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, यदि यह दृश्यरूपी विष पूर्वोक्त रीति से स्वप्न की प्रतीति
के समान मिथ्या है, तो यह इतनी सुदृढ प्रतीति से युक्त कैसे हो गया, अर्थात् प्रलय होने तक
इसमें ऐसी सुदृढ प्रतीति रहती है कि व्यवहार में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं होने पाती, इसका
क्या कारण है ? दृश्य के विद्यमान रहते द्रष्टा (दर्शक) का निवारण नहीं किया जा सकता अर्थात्
दृश्य यदि रहेगा, तो उसका द्रष्टा भी अवश्य रहेगा और द्रष्टा यदि रहेगा, तो दृश्य भी अवश्य
रहेगा । भाव यह कि दृश्य ओर द्रष्टा परस्पर सापेक्ष हैं । दृश्य तभी कहा जा सकता है, जबकि
उसका दर्शक हो और द्रष्टा तभी कहा जा सकता है, जब कि उसके दर्शन का विषय (दृश्य)
हो । दृश्य ओर द्रष्टा दोमें से एक के अस्तित्व में दोनों का बन्धन है और दोनों में से एक का भी
क्षय हो जाय तो दोनों की मुक्ति हो जाती है, पर ऐसा होना ही असम्भव है