Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verses 18–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 18-20
संस्कृत श्लोक
यदिदं दृश्यते किंचित्सदैवात्मनि संस्थितम् ।
नास्तमेति न चोदेति जगत्किंचित्कदाचन ॥ १८ ॥
यथा द्रवत्वं सलिलं स्पन्दनं पवनो यथा ।
यथा प्रकाश आभासो ब्रह्मैव त्रिजगत्तथा ॥ १९ ॥
यथा पुरमिवास्तेऽन्तर्विदेव स्वप्नसंविदः ।
तथा जगदिवाभाति स्वात्मैव परमात्मनि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अतः पहले जो जगत् ब्रह्ममात्र है, ऐसी प्रतिज्ञा की गई थी, वह सिद्ध हुई, ऐसा कहते हैं ।
यह जो कुछ प्रपंच दिखलाई देता है, यह सदा ही आत्मा मेँ स्थित हे । न तो यह कभी कुछ
भी उदित होता है और न कभी तनिक भी नष्ट होता है । जैसे द्रवत्व जल है (तरलता ओर
जलमें कोई भेद नहीं है), जैसे स्पन्दन वायु है (कम्पन और वायुमें भेद नहीं है) और जैसे
प्रकाश आभास है । (प्रकाश और आभास में कोई अन्तर नही है), वैसे ही ये तीनों जगत् ब्रह्म
ही है (त्रिजगत् ओर ब्रह्मम कोई अन्तर नहीं है) | जैसे स्वप्न देखनेवाले पुरुष के अन्दर
विद्यमान चैतन्य ही नगर-सा प्रतीत होता है, वैसे ही परमार्थ स्वरूप में परमात्मा ही जगत्-
सा प्रतीत होता हे