Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
संवित्कचनमेवान्तर्यथा स्वप्ने जगद्भ्रमः ।
सर्गादौ ब्रह्मणि तथा जगत्कचनमाततम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त विषय को ही स्पष्ट करते है ।
स्वप्न में स्वप्न देखनेवाले पुरुष के अन्तःकरण में जो स्वाप्निक जगत् की भ्रान्ति होती है,
वह जैसे संवित्-विकास ही है, वैसे ही सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्य में यह जगत्-विकास हुआ है,
ब्रह्म से अतिरिक्त जगत् नाम की कोई वस्तु ही नहीं हे