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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । इदं रूपमिदं दृश्यं जगन्नास्तीति भासुरम् । महाप्रलयसंप्राप्तौ भो ब्रह्मन्क्वेव तिष्ठति ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रलयकाल में “यह जगत्‌ है“ इस प्रकार विशेषरूप सत्ता से जगत्‌ की निवृत्ति होने पर भी ब्रह्मरूप सामान्य सत्ता के अवशिष्ट रहने से जगत्‌ की ब्रह्मरूप से सत्ता भले ही हो, किन्तु सृष्टिकाल में तो जगत्‌ की प्रलयकाल से विलक्षणता सबको स्पष्ट ही दिखाई देती है, अतः जगत्‌ की स्वतन्त्र सत्ता भी दूसरी माननी ही पफड़गी । ऐसी अवस्थामे उक्त स्वतन्त्र सत्ता से युक्त जगत ब्रह्म में वर्तमान न होता हुआ अन्यत्र स्थित है, ऐसी संभावना भी नहीं रोकी जा सकती, क्योकि आप पहले “नाऽभावो विद्यते सतः“ से सत्‌ की असत्ताका स्वयं वारण कर चुके हैं। इसलिए प्रलयकाले जहाँ पर जगत्‌ स्थित रहेगा, वही जगत्‌ का आश्रय माना जायेगा, उसका आप मुझे उपदेश दीजिए, इस आशयसे श्रीरामचन्द्रजी बोले : ब्रह्मन्‌. चौदह भुवन, देवता, मनुष्य, असुर, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि असीम विस्तारवाला अतिस्पष्टरूप से दिखाई देनेवाला, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से दढीकृत यह जगत्‌, जिसका आप ब्रह्म में अभाव कहते हैं, महाप्रलय होने पर किसमें स्थित रहता है, उसे कृपा करके मुझसे कहिए

सर्ग सन्दर्भ

ढसर्वौ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग सत्रूप अधिष्ठानवश प्रलयकाल मेँ भी जगत्‌ की सत्ता का प्रतिपादन ओर स्वतः तो सृष्टिकाल में भी उसकी सत्ता के अभाव का प्रतिपादन |