Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
देशकालादि शान्तत्वात्पुत्रिकारचनं द्रुमे ।
संभवत्ययथाऽतो वै तेनानन्ते विमुह्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि खम्भ में प्रतिमा के समान प्रलयकाल में जगत् है, तो उसके विषय में
वादियों को संशय क्यो होता है, स्तम्भ की प्रतिमा के विषय में तो किसी को सन्देह नहीं
होता ? इस पर कहते है ।
पेड़ को चीर कर बनाये गये खम्भे में प्रतिमा का निर्माण हो सकता है, कारण कि जहाँ
शिल्पी अपना शिल्प करे, ऐसा स्थान, दिन आदि काल तथा बसुला अदि सभी उपकरण वहाँ
विद्यमान हैँ, अतएव खम्भे में प्रतिमा की सत्ता की संभावना की जा सकती है, किन्तु अनन्त
(देशतः, कालतः ओर परिमाणतः अपरिच्छिन्न यानी देश, काल परिमाण- इन तीन प्रकार
के परिच्छेदों से रहित) ब्रह्म में उक्त सामग्री का सर्वथा अभाव है, अतः प्रलयकाल में जगत्
की सत्ता के विषय में वादियों को सन्देह होता है