Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
सौम्याम्भसि यथा वीचिर्न चास्ति नच नास्ति च ।
तथा जगद्ब्रह्मणीदं शून्याशून्यपदं गतम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोड शंका करे कि उस समय यदि जगत् का अस्तित्व है, तो वह प्रलयकाल नहीं
कहा जा सकता । यदि जगत् का अस्तित्व नहीं है, तो शून्यता प्राप्त ही हो गई, इस प्रकार से
सत्व और असत्त्व के व्याघात को दृष्टान्त द्वारा हटाते है ।
जैसे शान्त (विक्षोभ शून्य-अचंचल) जल में लीन वीचिकी (लहर की) न तो सत्ता है ओर
न असत्ता है अर्थात् उसमें न वीचि है, यह कह सकते हैं और न नहीं हे, यह कह सकते हैं, वैसे
ही ब्रह्म में लीन यह जगत् भी न शून्य है और न अशून्य है, अर्थात् अनिर्वचनीय है, अथवा शून्य
ओर अशून्य दोनों कल्पनाओं के अधिष्ठान परमार्थ वस्तु (ब्रह्म) को प्राप्त हुआ हे