Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
वर्तमानाश्च याः सन्ति त्रैलोक्यगणकोटयः ।
शक्यन्ते ताश्च संख्यातुं नैव काश्चन केनचित् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे व्यास आदि भी असंख्य उत्पन्न होते हैं, यह सूचित हुआ।
जो कोटि-कोटि त्रिजगत् इस समय विद्यमान हैं, उनमें भी कोई किन्हीं की गिनती नहीं
कर सकता