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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

भविष्यन्ति पराम्भोधौ जन्तसर्गतरङ्गकाः । तांश्च वै परिसंख्यातुं सा कथैव न विद्यते ॥ ६ ॥ श्रीराम उवाच । या भूता या भविष्यन्त्यो जगत्सर्गपरम्पराः । तासां विचारणा युक्ता वर्तमानास्तु का इव ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

परमात्मारूपी महासागर में जगत्‌सृष्टिरूपी जो तरंग होंगे, उनकी गिनती करने के लिए भी वाणी में सामर्थ्य नहीं है इस कथन से भूत, भविष्यत्‌ और वर्तमान जगत्‌ का अध्यारोप दशार्या। पूछे गये विषयकी उपेक्षा कर अन्य विषय को कह रहे श्रीगुरुजीका गूढ आशय मैंने भलत्री-भाँति जान लिया, यों गुरु की उत्साहवृद्धि के लिए अपनी कुशलता को सूचितकर रहे श्रीरामचन्द्रजी उक्त भूत, भविष्यत्‌ और वर्तमान सृष्टियों में कुछ विलक्षणता कहते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : जो जगत्‌सृष्टिपरम्पराएँ अतीत हो गई हैं और जो आगामी हैं, उनका विचार करना तो ठीक है, परन्तु वर्तमान जो सृष्टियाँ हैं वे किसके सदृश हैं, अर्थात्‌ वे न भूत के सदृश हैं और न भविष्यत्‌ के सदुश हैं । वर्तमान सृष्टिपरम्परा में दोनों की समानता नहीं हे, अतः उनकी श्रेणी में वर्तमान सृष्टि की विवेचना करना ठीक नहीं है आशय यह कि यद्यपि वर्तमान सृष्टियाँ विशेषरूप से (तत्तद्व्यक्तित्वरूपसे) असंख्य हैं, तथापि कालत:- पूर्व और उत्तर कालरूप-दोनों तटों का भान होने से भूत और भविष्यत्‌ सृष्टि की अपेक्षा वे न्यूनसंख्यक होने के कारण विदित ही हैं । इस प्रकार आपने यह दर्शाया कि अनन्त आगन्तुको का उपादान आत्मतत्त्व अनन्त, अद्वितीय, अनागन्तुक और चैतन्यस्वरूप है । यह मैं जान गया हूँ