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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । परमार्कप्रकाशान्तस्त्रिजगत्त्रसरेणवः । उत्पत्योत्पत्य लीना ये न संख्यामुपयान्ति ते ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कहिए कि यह सन्देह ही नहीं बन सकता है, सो नहीं कह सकते, क्योकि अत्यन्तिक दुःखविनाश से उपलक्षित (युक्त) निरतिशय स्वप्रकाशमात्र शेष रहना ही विदेहमुक्त हे ओर वही ज्ञान का फल है । वह यदि सर्वज्ञ श्रीव्यासजी को प्राप्त नहीं हुई, तो ज्ञान अनित्यफल हो जायेगा अर्थात्‌ ज्ञान से मुक्तिरूप फल अवश्यंभावी न होगा । दूसरी बात यह भी है कि यदि ज्ञान से अज्ञान निःशेष नष्ट हो गया, तो भृगु आदि के समान जीवन नहीं रह सकेगा, क्योकि अज्ञानरूप उपादान के नष्ट होने से कार्य नहीं रह सकता ओर जीवन न रहने पर ब्रह्मविद्या के उपदेश के न रहने से ब्रह्मविद्या का प्रवर्तक सम्प्रदाय ही विच्छिन्न हो जायेगा। यदि ज्ञान से अज्ञान उच्छिन्न न हुआ, तो मोक्षअभाव सिद्ध ही है । कर्मके तुल्य ज्ञान अदृष्ट के द्वारा मरण के पश्चात्‌ फल नहीं देता, क्योकि वह कर्म के तुल्य विधेय नहीं है, कारण कि ज्ञान तीनों कार्लो में अखण्डरूप से स्थित है, इस प्रकार जीवन्मुक्ति की सिद्धि नहीं हो सकती, यह सारांश है । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी द्वारा पूछे गये भगवान्‌ वसिष्ठ, जब तक श्रीरामचन्द्रजी बन्ध की अविद्याजन्यता, विद्या का स्वरूप और उसके साक्षी अपरिच्छिन्न स्वाधार चैतन्यस्वरूप को नहीं जानते, तव तक जीवन्मुक्ति में इनका विश्वास नहीं हो सकता, इसलिए पहले उनका उपपादन कर, तदुपरान्त इनके प्रश्न का समाधान करूँगा, यो विचारकर सुबोध होने के कारण पहले साक्षी में स्थूलप्रपवपरम्परा का अध्यारोप दिखलाते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : सम्पूर्णं जगत्‌ का प्रकाशक सूर्य अर्क कहलाता हे । सूर्य ([>) आदि सम्पूर्ण जगत्‌ का प्रकाशक परमात्मा परमार्कं हुआ। उक्त परमार्क रूपी प्रकाशके अन्दर (3 “यैन सूर्यस्तपति तेजसिद्धः*, “न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्‌“ अर्थात्‌ जिस परमात्मारूप तेजसे दीप्त होकर सूर्यं तपता है ओर उस तेजस्वरूप परमात्मा में न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और न तारे ही प्रकाश को प्राप्त होते हैं, इत्यादि श्रुति-स्मृतियाँ हैं । त्रिजगत्रूपी (अनन्त कोटि ब्रह्माण्डरूपी) त्रसरेणु (५६) स्थित हो होकर लीन हो गये हैं, उनकी गिनती नहीं हो सकती