Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, Verses 49–50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, verses 49–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 49,50
संस्कृत श्लोक
परमाणौ परमाणौ चिदाकाशः स्वकोटरे ।
जगल्लक्ष्मीसहस्राणि धत्ते कृत्वाथ पश्यति ॥ ४९ ॥
विततता हृदयस्य महामतेर्हरिहराञ्जजलक्षशतैरपि ।
तुलनमेति न मुक्तिमतो यतः प्रविततास्ति निरुत्तमवस्तुनः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
विस्तारशून्य प्रदेश मेँ अतिविस्तारयुक्त जगत् की प्रतीति कैसे होती है। ऐसी शंका होने
पर छोटे से दर्पण के अन्दर मेघ, ग्रह और नक्षत्रों से युक्त आकाश का समावेश सबको दिखाई
देता है, अतः अज्ञान के लिए यह कोर्ड कठिन काम नहीं है कि विस्तारशून्य प्रदेश में
अतिविस्तारयुक्त जगत् दिखलाई दे, इस अभिप्राय से कहते है ।
चेतन्यघन परमात्मा अपने भीतर कल्पित आकाश में, परमाणु-परमाणु में हजारों जगतां
को स्वयं बनाकर धारण करता हे ओर स्वयं उन्हें देखता हे । श्रीरामचन्द्रजी, महामति जीवन्मुक्त
पुरुष का हृदय परमात्मा ही हे, उसकी विस्तीर्णता का माप करोड़ों हरि, हर आदि भी नहीं कर
सकते । उनकी ऐसा करने की सामर्थ्य नहीं हे, सो बात नहीं है, किन्तु सत्ता से, अनन्तता से
ओर आनन्दस्वरूपता से जिससे बढ़कर उत्कृष्ट कोई वस्तु ही नहीं है, उस परमात्मा की
अपरिच्छिन्नता पारमार्थिक ही है, आकाश आदि की तरह द्रष्टा पुरुष की शक्ति से कल्पित
नहीं हे, यह भाव है